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जब पत्थर पर बनाए गए थे निजाम के लिए कबाब



हेल्थ डेस्क. अगर आप दक्षिण भारत की यात्रा पर गए तो वह अधूरी ही मानी जाएगी, अगर आप मोतियों के शहर यानी हैदराबाद नहीं जा पाए। हैदराबाद कभी निज़ाम शासकों की राजधानी हुआ करता था। यह शहर अपनी शिल्पकला और वास्तुकला के साथ-साथ निज़ामों की भव्य लाइफस्टाइल और खाने-पीने को लेकर उनके शौक के लिए भी जाना जाता रहा है।

हैदराबादी निज़ामों के खानपान पर अरबी, ईरानी और तुर्की के खानपान का खासा असर रहा है। निज़ामों के व्यंजनों में केसर, केवड़ा और यहां तक कि इत्र जैसे महंगे इंग्रेडिएंट हुआ करते थे। वैसे तो निज़ामों के समय अनेक तरह की कई नई डिशें ईजाद हुईं। लेकिन आज शेफ हरपाल सिंह सोखी खास तौर पर बात कर रहे हैं’पत्थर का गोश्त’ की, जिसे ‘पत्थर का कबाब’ भी कहते हैं।

ग्रेनाइट के पत्थर पर बनाए जाते हैं पत्थर के कबाब

यह डिश मूलत: 19वीं सदी के उत्तरार्ध में उस समय ईजाद की गई थी, जब हैदराबाद में निज़ाम मीर महबूब अली खान शासन किया करते थे। महबूब अली खान अपनी राजसी जीवनशैली के लिए प्रसिद्ध थे। उनके केवल तीन शौक थे – अच्छे व नए-नए वस्त्र पहनना, अच्छा भोजन करना और शिकार करना। कहा जाता है कि वे एक वस्त्र दोबारा कभी नहीं पहनते थे। जब वे शिकार पर निकलते, तो उनके साथ वस्त्रों से भरे कई बॉक्स होते थे। खाना पकाने के लिए उनके कारवां में कई खानसामा भी होते थे। ‘पत्थर का कबाब’ डिश का ईजाद महबूब अली के ऐसे ही एक शिकार कार्यक्रम के दौरान हुआ था। हुआ यूं कि एक बार शिकार के दौरान खानसामा वे बर्तन इत्यादि ले जाना भूल गए जो कबाब बनाने के लिए जरूरी थे। दोपहर के वक्त शिकार से फुर्सत पाने के बाद निज़ाम ने कबाब खाने की इच्छा जताई। अब कबाब पकाने के लिए जरूरी बर्तन तो थे नहीं और यह बात निज़ाम को भी नहीं बता सकते थे। गौरतलब है कि आंध्रप्रदेश में ग्रेनाइट पत्थर बहुतायत में पाया जाता है। गर्मी के दौरान ग्रेनाइट के पत्थर भट्टी जैसे गर्म हो जाते हैं। तो ऐसे में एक खानसामा ने ग्रेनाइट के ऐसे ही पत्थर का इस्तेमाल कबाब बनाने में कर लिया। संयोग से निज़ाम को वे कबाब बहुत पसंद आए। वास्तविकता से अनजान निज़ाम ने अपने खानसामों से पूछा कि आज कबाब इतने स्वादिष्ट क्यों लग रहे हैं, पहले तो कभी ऐसे नहीं बने? इस पर खानसामों ने डरते-डरते सच बता दिया। सच जानकर निज़ाम महबूब अली नाराज नहीं हुए, बल्कि उन्होंने भविष्य में अपने महल में भी कबाब बनाने के लिए इसी पत्थर का इस्तेमाल करने का हुक्म दे दिया। यहीं से पत्थर का गोश्त या पत्थर का कबाब डिश प्रचलन में आई।

पत्थर के खुरदुरेपन से आता है अनूठा स्वाद

पत्थर का गोश्त बनाने में कुछ खास बातों का ध्यान रखा जाता है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है सही ग्रेनाइट पत्थर का चयन। ग्रेनाइट का पत्थर न तो इतना पतला होना चाहिए कि वह अधिक गर्मी में क्रेक हो जाए और न ही इतना मोटा कि वह अतिरिक्त गर्मी को अपने अंदर ही समेट ले। उसे केवल एक अच्छा कंडक्टर (ताप परिचालक) होना चाहिए। इस डिश में बोनलेस मटन को लहसुन, अदरक, मिर्च पाउडर, नमक और कच्चे पपीते के पेस्ट में कम से कम चार घंटे के लिए मेरिनेट किया जाता है। कई लोग इसे रातभर मेरिनेट करते हैं। इसके बाद इसे पत्थर पर रोस्ट किया जाता है। पत्थर से छनकर मिलती गर्मी और पत्थर का खुरदुरापन इसे बिल्कुल अलग स्वाद देता है, जिसके बारे में केवल इसके चाहने वाले ही बता सकते हैं।

और चलते-चलते निज़ाम और उनकी रसोई से जुड़े कुछ रोचक तथ्यों की बात भी कर लेते हैं। निज़ामों के मेहमानों को जब भी दावत दी जाती थी, तो 49 तरह की बिरयानी परोसी जाती थी। इसके अलावा निज़ाम के रसोईघर में प्याज की खीर भी बनाई जाती थी। निज़ामों के राजकीय ध्वज में कुलछा बना हुआ था।

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Food history by harpal singh sokhi- story of patthar ka gosht or patthar ke kebab

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