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ट्रैफिक और प्रदुषण से मिलेगी राहत, 1200 kmph की रफ्तार से हो सकेगी यात्रा



ऑटो डेस्क.क्या हाइपरलूप सिस्टम से 1000-1200 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार के जमीनी सफर का सपना पूरा हो सकता है? शायद हां, शायद ना। विमानों के लिए यह रफ्तार आम बात है, लेकिन हाइपरलूप जमीनी परिवहन में वैसी ही क्रांति ला सकता है जैसी कि कभी विमान लाए थे। हाइपरलूप, माने हजारों किलोमीटर लंबी ट्यूब्स या सुरंगों के भीतर से छोटी-छोटी पॉड्स या वाहनों का गुजरना। परिवहन का यह तौर-तरीका अब तक की किसी भी प्रणाली से मैच नहीं करता है। यह सबसे अलग और अद्वितीय है।

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वैक्यूम ट्यूब में चलते हैं पॉड

जिन ट्यूब्स या सुरंगों के भीतर से पॉड्स को गुजरना है, उनमें से हवा को पूरी तरह से निकाल दिया जाता है ताकि उनके भीतर घर्षण न हो। चूंकि घर्षण रफ्तार को कम करता है, इसलिए उसकी गैर-मौजूदगी में ये पॉड वाहन 1200 किमी प्रति घंटे तक की रफ्तार से यात्रा कर सकेंगे। इन वाहनों में पहिए नहीं होते और वे खाली स्थान में तैरते हुए आगे बढ़ते हैं। कुछ-कुछ इसी अंदाज में बुलेट ट्रेन भी यात्रा करती है लेकिन यहां पर बात निर्वात सुरंगों के भीतर यात्रा करने की हो रही है।

हाइपरलूप के परीक्षण हुए हैं लेकिन फिलहाल यह इस्तेमाल के लिए उपलब्ध नहीं है। उम्मीद है कि 2021 तक दुनिया में पहला हाइपरलूप रूट काम करना शुरू कर देगा। दो कंपनियां इस काम में सबसे आगे हैं- “स्पेसएक्स’ और “हाइपरलूप वन’। दोनों के मालिकों के नाम आपने सुने ही होंगे। ये हैं- एलन मस्क और रिचर्ड ब्रैन्सन।

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क्या होगा फायदा

यात्राओं के इस विकल्प की ज़रूरत क्यों पड़ी? यह सवाल बहुत मुश्किल नहीं है। परिवहन की रफ्तार को तेज से और तेज करते चले जाने की ज़रूरत पड़ रही है ताकि मुसाफिरों और सामान को ढोने का समय कम से कम किया जा सके। परिवहन महंगा भी हो रहा है और ट्रैफिक बढ़ रहा है। आधारभूत सुविधाओं के निर्माण के खर्चे बढ़ रहे हैं, प्रदूषण बढ़ रहा है, विमान यात्राओं पर मांग का दबाव बढ़ रहा है। दूसरे विकल्प बहुत तेज नहीं हैं। समुद्री यात्राएं बहुत धीमी हैं, रेल यात्राओं का भी वही हाल है और जमीनी वाहनों का भी।

बुलेट ट्रेन जैसी तकनीकें बेहद महंगी हैं जिनके टिकट विमानों से भी ज्यादा महंगे हैं। हाइपरलूप परिवहन के लिए सुरंगें बनाने पर तो बहुत ज्यादा खर्च होगा लेकिन बाकी प्रणालियों में बिजली का इस्तेमाल होता है। हाइपरलूप में बिजली की खपत बहुत कम होगी।

इसका मतलब यह है कि इसमें यात्रा न सिर्फ सुपर फास्ट होगी बल्कि सुपर सस्ती भी और इसमें प्रदूषण का नाम भी नहीं होगा और न ही ट्रैफिक जाम जैसी चीजें कभी आएंगी क्योंकि हर पॉड को एक ही सुरंग के भीतर से गुजरना है। मिसाल के तौर पर अमेरिका के लॉस एंजिलिस और सैन फ्रासिस्कों शहरों के बीच 620 किमी की यात्रा का टिकट मात्र 20 डॉलर यानी करीब 1400 रुपए का। यात्रा करीब आधे घंटे में ही पूरी हो जाएगी।

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कहां-कहां होंगे रूट

आपको यह जानकर खुशी और हैरत दोनों होंगी कि हाइपरलूप के लिए शुरुआती तौर पर जो रूट प्रस्तावित हैं, उनमें अमेरिका, कनाडा, यूरोप और दुबई के कुछ मार्गों के साथ-साथ भारत के भी कई मार्ग शामिल हैं। मसलन- मुंबई से पुणे, चेन्नई से मुंबई, अमरावती से विजयवाड़ा और चेन्नई से बेंगलुरु। दुनिया के दूसरे अहम मार्गों में न्यूयॉर्क से वाशिंगटन, पेरिस से एम्सटर्डम, टोरंटो से मॉन्ट्रियल और जाबेल अली से दुबई शामिल हैं।

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इन मुख्य चुनौतियां पर करना होगा काम

तकनीक क्रांतिकारी है मगर आसान नहीं है। अमेरिका के नेवादा रेगिस्तानी क्षेत्र में छोटी दूरियों के बीच इसके सफल परीक्षण हो चुके हैं लेकिन चुनौतियां भी बहुत हैं। एक हजार किलोमीटर प्रति घंटे से भी ज्यादा तेज रफ्तार से चल रहे वाहनों को अगर इमरजेंसी में ब्रेक लगाना पड़ा तो क्या होगा? क्या वाहन खुद और यात्री इसके प्रभाव को झेल पाएंगे? अगर वाहनों को कहीं घूमना पड़ा तब क्या वे ट्यूब के किनारों से नहीं टकरा जाएंगे?

जरा सोचिए कि हम अपनी कार या मोटर साइकिल से 50-60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से भी जब सड़क पर टर्न लेते हैं तो वह कोई कम खतरनाक अनुभव नहीं होता। बीस गुना ज्यादा रफ्तार से चल रहे वाहन के साथ क्या होगा, वह भी तब जब सुरंग बहुत संकरी है? इस संकरेपन की वजह से पॉड्स की चौड़ाई बहुत कम होगी और लोगों को बैठने तथा इधर-उधर हिलने-डुलने के लिए अधिक आजादी नहीं होगी।

बहुतों के लिए यह एक डरावना अनुभव भी हो सकता है, खास तौर पर इसलिए कि वाहनों में खिड़कियां भी नहीं होंगी और आप बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटे होंगे। एक आशंका यह भी कि अगर बीच रास्ते में बिजली चली गई तो? अगर कभी भूकंप आया या फिर कोई हल्की-सी भी भूगर्भीय गतिविधि हुई तो यात्रियों की सुरक्षा और पूरे ढांचे की बनावट खतरे में तो नहीं पड़ जाएगी? सवाल बहुत हैं और चिंताएं भी। लेकिन आने वाला समय इनके जवाब तलाश ही लेगा, उम्मीद करनी चाहिए।

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