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पंजाबी में दही भल्ले और कन्नड़ में मेदुवड़ा कहते हैं, कश्मीर से कन्याकुमारी तक डिशेज में है शामिल



  1. 12 वीं शताब्दी में कर्नाटक के राजा सोमेश्वर तृतीय द्वारा रचित ग्रंथ ‘मनसोल्लास’ में इसका वर्णन ‘क्षीरवड़ा’ के नाम से मिलता है। जितने विविध रंगों में यह पाया जाता है उतने ही विविध हैं इसके नाम। उर्दू में दही बर्रे, पंजाबी में दही भल्ला, थायिर वड़ाई तमिल में, थायरु वड़ा मलयालम में और तेलुगू में पेरुगु वड़ा। दही भल्ले थोड़े से अलग होते हैं। इनमें पपड़ी, तले आलू और चने का इस्तेमाल किया जाता है जो इसे एक नया स्वाद देते हैं।

  2. वड़े को तलने के बाद पहले पानी में रखा जाता उसके बाद गाढ़े दही में डुबोया जाता है। धनिया या पुदीने की पत्तियां, लाल मिर्च पाउडर, पिसी काली मिर्च, चाट मसाला, जीरा, खोपरे का बूरा आदि से दही को नया स्वाद दिया जाता है। कई राज्यों में मीठे दही को वरीयता दी जाती है, ख़ासकर महाराष्ट्र और गुजरात में। अधिकतर स्थानों पर इमली की चटनी इसमें ज़रूर होती है। उत्तर भारत में खाया जाने वाला वड़ा दक्षिण भारत से थोड़ा अलग होता है। उत्तर भारत में इसका स्वाद बढ़ाने के लिए हरी चटनी, सौंठ या इमली की चटनी के साथ परोसा जाता है तो वहीं दक्षिण में यह नारियल की और हरी मिर्च के पेस्ट के साथ खाया जाता है।

  3. दही वड़े के अलावा उत्तरभारत में दही पकौड़ी और दही गुझिया भी पसंद की जाती है। वड़ा दही के साथ ही नहीं बल्कि इडली, साम्भर आदि के साथ खाया जाता है। वड़ा परिवार का ही एक प्रसिद्ध सदस्य है मेदुवड़ा। कन्नड़ में मेदु का अर्थ होता है ‘मुलायम’ और वड़ा का अर्थ है टिकिया। कहा जाता है कि सबसे पहले कर्नाटक के मद्दुर में मेदुवड़ा बनाया गया था।

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