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पुलिस का डिजिटल जाल बनी गूगल की ट्रैकिंग टेक्नोलॉजी



जेनिफर वेलेंटिनो
टेक्नोलॉजी कंपनियों के हर स्थान से डेटा जुटाने के दौर में लगातार चिंताजनक सवाल उठ रहे हैं। पुलिस और जांच एजेंसियां इस जानकारी का उपयोग संदिग्ध अपराधियों को पकड़ने में कर रही हैं। लेकिन, इसके साथ कुछ खतरे भी जुड़े हैं। निर्दोष लोगों को अकारण परेशानी उठानी पड़ सकती है। गूगल का सेंसरवाल्ट डेटाबेस पुलिस और जांच एजेंसियों का डिजिटल जाल बन गया है। डेटाबेस के पास दुनियाभर के करोड़ों डिवाइस का दस वर्ष पुराना लोकेशन रिकॉर्ड है। इसके दुरुपयोग के मामले सामने आने लगे हैं।

अमेरिका में डेटा ट्रैकिंग में बेकसूर व्यक्ति के फंसने का एक मामला अभी हाल में सामने आया है। पिछले वर्ष दिसंबर में फीनिक्स, एरिजोना में पुलिस ने एक हत्या की जांच के सिलसिले में वेयरहाउस कर्मचारी जोर्गे मोलिना को गिरफ्तार किया था। उन्होंने, मामले का रहस्य सुलझाने का श्रेय नई टेक्नोलॉजी को दिया है। मोलिना के फोन डेटा की ट्रैकिंग पुलिस को उस जगह ले गई जहां नौ माह पहले एक व्यक्ति की हत्या कर दी गई थी। पुलिस ने सर्च वारंट के जरिए टेक्नोलॉजी कंपनी गूगल से घटनास्थल पर सभी तरह के डिवाइस पर रिकॉर्ड जानकारी ले ली। लेकिन, नए सुराग मिलने पर एक सप्ताह बाद मोलिना को जेल से रिहा कर दिया गया। हत्या के मामले में पिछले माह पुलिस ने मोलिना की मां के पूर्व प्रेमी को गिरफ्तार कर लिया। मोलिना ने कहा उसे डेटा के आधार पर गिरफ्तार किए जाने से आश्चर्य हुआ है।

मोलिना का मामला नई जांच टेक्नोलॉजी के फायदे और नुकसान का प्रमाण है। गूगल कर्मचारियों के अनुसार पिछले छह माह से इस टेक्नोलॉजी का उपयोग ज्यादा बढ़ा है। टेक्नोलॉजी कंपनियां वर्षों से अदालत के आदेशों पर खास यूजर जानकारी देती रही हैं। जियोफेन्स नामक नए वारंट इससे आगे चले गए हैं। ये अन्य सुरागों के अभाव में संभावित संदिग्धों और गवाहों की तरफ इशारा करते हैं। गूगल कर्मचारियों का कहना है, अक्सर कंपनी एक ही वारंट पर दर्जनों या सैकड़ों डिवाइस की लोकेशन जानकारी देती है। पुलिस अधिकारी नई प्रक्रिया को अच्छा तो बताते हैं पर आगाह करते हैं कि यह केवल एक औजार है।

वाशिंगटन राज्य के सीनियर प्रोसीक्यूटर गैरी अर्न्सडोर्फ का कहना है, गूगल की जानकारी के आधार पर हम किसी को आरोपी नहीं बना सकते हैं। गूगल कर्मचारियों के अनुसार पहली बार प्रक्रिया का उपयोग फेडरल एजेंटों ने 2016 में किया था। इसके बाद यह अमेरिका के कई राज्यों में शुरू हो गई। कंपनी को इस वर्ष एक सप्ताह में ऐसी जानकारी देने के 180 अनुरोध मिल चुके हैं।

जांचकर्ताओं ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया कि उन्होंने, जियोफेन्स वारंट गूगल के अलावा किसी अन्य कंपनी को नहीं भेजे हैं। एपल ने कहा कि उसके पास एेसी खोज करने की क्षमता ही नहीं है। सैन मेटिओ काउंटी के शेरिफ ऑफिस के इंटेलीजेन्स एनालिस्ट आरोन ईडन ने बताया, अधिकांश एंड्रॉयड डिवाइस और कुछ आई फोन ने ये डेटा गूगल को मुहैया कराया है। गूगल के इंफॉर्मेशन सिक्यूरिटी डायरेक्टर रिचर्ड सेलगाडो ने बताया कंपनी पुलिस और जांच एजेंसियों को जरूरी काम में सहयोग देने के साथ यूजरों की प्राइवेसी की रक्षा करती है।

जानकारी देने की टेक्नोलॉजी इस तरह काम करती है

पुलिस जियोफेन्स वारंट ऑर्डर जारी कर क्षेत्र और स्थान का ब्योरा मांगती है। गूगल सेंसरवाल्ट उस समय वहां मौजूद सभी डिवाइस की जानकारी एकत्र करता है। इन्हें अज्ञात आईडी नंबर के साथ देते हैं। खुफिया पुलिस के एजेंट लोकेशन और आवाजाही के पैटर्न देखते हैं कि क्या ये संबंधित अपराध से मेल खाते हैं। जब कुछ डिवाइस से इकट्ठी जानकारी के आधार पर संभावित संदिग्ध या गवाह का अनुमान लगता है तब गूगल यूजर के नाम और अन्य जानकारी बताता है।

पुलिस के लिए नहीं है यह

सेंसरवाल्ट डेटाबेस पुलिस और जांचएजेंसियों की जरूरतों के लिए डिजाइन नहीं किया गया है। गूगल का डेटाबेस विराट है लेकिन वह हर फोन सेजानकारी नहीं जुटा सकता है।

लोकेशन डेटा से बना बीस अरब डॉलर का मार्केट

लोकेशन डेटा का बिजनेस बहुत फायदेमंद है। एंड्रॉयड फोन के साथ गूगल इस मैदान का सबसे बड़ा खिलाड़ी है। वह लोकेशन डेटा के आधार पर विज्ञापन भेजता है। पिछले वर्ष लोकेशन पर आधारित डेटा का बाजार 20 अरब डॉलर था। 2009 में कंपनी ने लोकेशन हिस्ट्री फीचर शुरू किया है। सेंसरवाल्ट इस फीचर का उपयोग करने वालों की जानकारी स्टोर करता है। यह जीपीएस सिगनल, सेलफोन टॉवर, वाईफाई डिवाइस और ब्लूटूथ बीकन से ली जाती है।

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