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प्रमुख सचिव के आदेश के बावजूद नए ट्यूबवेल की जानकारी सार्वजनिक नहीं कर रहे इंजीनियर



जयपुर। मुख सचिव के आदेश के बावजूदजलदाय विभाग फील्ड इंजीनियर नए ट्यूबवेल की जानकारी सार्वजनिक नहीं कर रहे हैं। प्रमुख सचिव ने तीन दिन पहले मीटिंग लेकर हर ट्यूबवेल की जानकारी विभाग की वेबसाइट पर डालने के निर्देश दिए थे, लेकिन ट्यूबवेल में मापदंडों की खुली अवहेलना, घटिया पाइप लगाने व कम पानी निकलने की आशंका व पोल खुलने के डर से इंजीनियर जगह को सार्वजनिक नहीं कर रहे हैं। वहीं मीटिंग में रखे आंकड़ों से कम ही ट्यूबवेल पेयजल सप्लाई से जुड़ पाए है। प्रमुख सचिव संदीप वर्मा ने यह जिम्मेदारी विभाग के एडिशनल चीफ इंजीनियर देवराज सोलंकी को दी थी।

50 करोड़ खर्च कर732 ट्यूबवेल खोदे जा रहे

शहर में पेयजल किल्लत से निपटने के नाम पर 50 करोड़ से ज्यादा राशि खर्च कर 732 ट्यूबवेल खोदे जा रहे है। एक ट्यूबवेल पर 5 से 7 लाख रुपए खर्च हो रहा है। शहर के दोनों सिटी सर्किल में 10 से ज्यादा कॉन्ट्रेक्टर काम कर रहे है, लेकिन इंजीनियर मॉनिटरिंग ही नहीं कर रही है। नए ट्यूबवेल में पाइप डालने का काम रात के अंधेरे में किया जा रहा है।

कुछ जगह लोगों ने विभाग के रीजन कार्यालय व सर्किल कार्यालय में शिकायत भी की, लेकिन कोई जांच व कार्रवाई नहीं की। इस बारे में एडिशनल चीफ इंजीनियर देवराज सोलंकी से सवाल पूछा तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। वहीं अधीक्षण अभियंता (नार्थ) आरसी मीना व अधीक्षण अभियंता (साउथ) देवेंद्र कोठ्यारी का कहना है कि नए ट्यूबवेल की सूचना आला अधिकारियों को भिजवा रहे है। विभाग की वेबसाइट या अन्य पब्लिक डोमिन पर जानकारी डालने की हमारे पास कोई व्यस्था नहीं है।

जनता चाहे तो तुलवा सकती है पाइप का वजन

जलदाय विभाग के जुड़े हुए कान्ट्रैक्टर पहले बोर करते है। इसके बाद रात को ट्यूबवेल के बोरिंग उतारते है। ट्यूबवेल में भारी वजन के पाइप व अच्छी क्वालिटी की रोडी डालनीहोती है ताकि पानी का दोहन सही तरीके से हो।कान्ट्रैक्टर ज्यादा बचत करने के लिए कम वजह का लोहे के पाइप व घटिया रोडी डाल देते है। इससे थोड़े दिन बाद ही ट्यूबवेल से पानी का दोहन कम हो जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि स्थानीय लोग भी ट्यूबवेल में डाले जा रहे लोहे के पाइप का मौके पर ही वजन करवा सकते हैंताकि इंजीनियर व ठेकेदार गड़बड़ नहीं कर सके।

न्यूज : श्याम राज शर्मा

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rajasthan news tubewell information not made public by govt officers despite principal secretary orders

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