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बंगाल, ओडिशा अब दोनों के पास जीआई टैग, पर रसगुल्लों का असली ‘कोलम्बस’ कौन है?



रसगुल्ले को लेकर ओडिशा और बंगाल के बीच रस्साकशी लंबे समय से चल रही थी। दोनों ही प्रदेशों में यह मानने वालों की संख्या कम न थी कि रसगुल्ला उन्हीं के पुरखों की ईजाद है। पिछले साल बंगाल ने भौगोलिक सूचक (जीआई) हासिल कर ओडिशा को पछाड़ दिया था। हाल ही में ओडिशा के रसगुल्ले ने भी यह मान्यता प्राप्त कर ली है।

जीआई टैग किसी वस्तु के किसी खास क्षेत्र या इलाके में विशेष होने की मान्यता देता है। अब किस्सा कुछ यंू है कि इतिहासकार बताते हैं कि दूध फाड़कर छेना बनाने की कला पुर्तगालियों ने बंगालियों को 16वीं सदी के बाद सिखलाई थी। पुर्तगालियों ने सेरमपुर में अपना ठिकाना बनाया था। पहले-पहल बंगालियों से ही उनका घनिष्ठ संबंध स्थापित हुआ। भद्रलोक बंगाल की दलील है मिठाई प्रेम उनके डीएनए का हिस्सा है और यह नायाब मिष्ठान्न हलवाई केसी दास के पूर्वजों के मौलिक प्रयोग से प्राप्त सौगात है।

वहीं ओडिशा का तर्क है कि जगन्नाथ मंदिर में भगवान को जो भोग लगता है उसमें सदियों से छेने की मिठाई शामिल है। ऐसे में पुर्तगालियों का रसगुल्ले के जन्म से दूर का भी नाता नहीं है। ओडिशा के लाेग याद दिलाते हैं कि लार्ड कर्जन द्वारा बंग भंग के पहले बंगाल के सूबे में बिहार के साथ ओडिशा भी शामिल था और निर्धन ओडिशा वासी अभिजात्य बंगाली घरों में मोइरा (रसोइए) के रूप में काम करते थे।

ऐसे में संभावना अधिक यह है कि इन्हीं में से किसी ने ‘कांचा गोला’ या ‘संदेश’ से छेड़छाड़ कर पहला रसगुल्ला बनाकर अपने बंगाली मालिकों को चखाया हो। भुवनेश्वर से कटक के मार्ग पर बढा नामक स्थान है जहां सड़क के दोनों ओर गुड़ जैसे रंग के भूरे रसगुल्ले बेचे जाते हैं। इसके साथ बिकलानंद कार का नाम जुड़ा है। कोलकता का कमतर मिठास वाला तथा ज्यादा स्पंज वाला रसगुल्ला इसी का परिष्कृत परिवर्तित अवतार लगता है। दिलचस्प बात यह है कि अविष्कारकर्ता भले ही ओडिया-बंगाली रहे हों, लेकिन आज सबसे बेहतरीन रसगुल्ले बनाने का कौशल ‘बीकानेरी’ मारवाड़ी कारीगरों ने हासिल कर लिया है जो ‘बंगाली’ मिठाइयों को बनाने में माहिर समझे जाते हैं।

दिल्ली की गोपाल डेयरी ने शुरुआत लाजपतनगर में अमर कॉलोनी की छोटी सी दुकान से की थी जहां सिर्फ बड़ा-सा रसगुल्ला, मिल्क केक पनीर बेचा जाता था। आज इसकी अनेक शाखाएं अनेक स्थानों पर रसगुल्लों के अलावा दूसरी बंगाली मिठाइयां, रबड़ी कलाकंद, लस्सी वगैरह बेचती हैं। अर्थात गुरु लोग गुड़ याने रसगुल्ले पर ही सर फुटौवल में व्यस्त रहे, चेले शक्कर बनकर करतब दिखा रहे हैं! बहरहाल ‘जीआई’ मिलने से ओडिशा के आहत स्वाभिमान को मलहम तो लगा ही है। यह आशा की जा सकती है कि अब स्पर्धा ग्राहकों को ‘सर्वश्रेष्ठ’ रसगुल्ला खिलाने के अखाड़े में जारी रहेगी।

बंगाली रसगुल्ला
दावा: इसे 1868 में नबिन चंद्र दास ने बनाया था। इन्हें रसगुल्ले का कोलम्बस कहा जाता है। बाद में उनके बेटे केसी दास ने इसे आगे बढ़ाया। बंगाली रसगुल्ला कम मिठास वाला, स्पंजी होता है। पश्चिम बंगाल में 14 नवंबर को रसगुल्ला डे मनाया जाता है।

उड़िया रसगुल्ला
दावा: 12वीं सदी से भगवान को भोग में चढ़ता रहा है। उड़िया रसोइयों ने बंगालियों को रसगुल्ला चखाया था। उड़िया रसगुल्ला थोड़ा गहरा भूरे रंग का होता है। ओडिशा में 30 जुलाई को रसगुल्ला दिवस।

पुष्पेश पंत,इतिहासविद्, फूड क्रिटिक, प्रोफेसर (स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जेएनयू)

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Both Bengal and Odisha claim – Rasgulla belongs to them

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