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Hindi News / स्वास्थ्य चिकित्सा / बच्चा गुमसुम रहे और दूसरों की बातें दोहराए तो पेरेंट्स हो जाएं अलर्ट, देश में ऑटिज्म के एक करोड़ बच्चे पीड़ित

बच्चा गुमसुम रहे और दूसरों की बातें दोहराए तो पेरेंट्स हो जाएं अलर्ट, देश में ऑटिज्म के एक करोड़ बच्चे पीड़ित



हेल्थ डेस्क. गुमसुम सा दिखना, आंखें मिलाकर बात न कर पाना और दूसरों की बातों को बेमतलब दोहराना ऑटिज्म के लक्षण हैं। इससे पीड़ित बच्चों को खास देखभाल की जरूरत है। आज वर्ल्ड ऑटिज्म जागरुकता दिवस है और इस साल की थीम है तकनीक से ऐसे बच्चों को जोड़ने के लिए तैयार करना। भारत में करीब एक करोड़ बच्चे ऑटिज्म से पीड़ित हैं। एक्सपर्ट्स बता रहे हैं ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों की मदद कैसे करें….

  1. जवाब: न्यूरोलॉजिस्ट श्रुति सरकार के मुताबिक, ऑटिज्म एक न्यूरोलॉजिकल स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर है जो ज्यादातर बच्चों में शुरू के ही तीन साल में दिखने लगता है। ऑटिज्म से ग्रसित बच्चों में तीन तरह के विकास बहुत धीमी गति से होता है जिन्हें ट्रायड ऑफ इम्पेयरमेंट कहते हैं। ये किसी बात करने में, जुड़ने में असहज महसूस करते हैं। जितनी कम उम्र में इसे पहचान लिया जाए उतनी ही आसानी से इलाज संभव है।

  2. जवाब : बात समझने में मुश्किल होना, आंखें मिलाकर बात न कर पाना, शब्दों की बेहद कम समझ होना, आंखे मिलाकर बात न कर पाना, हमेशा गुमसुम रहना, दूसरों की बातों को दोहराना जैसे लक्षण दिखने पर बच्चे को डॉक्टर के पास लेकर जाएं। इसके अलावा दो साल की उम्र तक बच्चा बोलना न सीख पाए, पेरेंट्स की बातें न सीख पाए, बार-बार आवाज देने के बाद भी न सुने या किसी तरह के व्यवहार में बदलाव आए तो डॉक्टर से मिलें।

  3. जवाब : सोशल एक्टिविस्ट विभांशु जोशी के मुताबिक, जिम्मेदारी की सबसे पहली शुरुआत घर से ही होनी चाहिए। बच्चे में व्यवहार में बदलाव दिखने पर पेरेंट्स पहले खुद समझें और डॉक्टर की सलाह लेकर ये जानें कि बच्चा इससे पीड़ित है या नहीं। उसके अकेला न छोड़ें और डॉक्टर से सलाह लेकर उसका पालन करें। स्कूल में अगर ऐसा बच्चा दिखता है तो प्रबंधन को उसे हरसंभव सुविधाएं उपलब्ध कराना चाहिए जिससे वह खुद को अकेला और असहाय महसूस न करे। समाज के स्तर पर भी लोगों को ऐसे बच्चों से भेदभाव नहीं बल्कि अच्छा व्यवहार करना चाहिए। इससे वह खुद को सामान्य बच्चों जैसा महसूस करेगा।

  4. जवाब: ऑटिज्म होने का कारण अब तक सामने नहीं आ पाया है। न्यूरोलॉजिस्ट श्रुति सरकार के मुताबिक, गर्भ में बच्चे के विकास के दौरान होने वाले नकारात्मक बदलाव भी इसका कारण हो सकते हैं। खास बात है कि पेरेंट्स कभी भी बच्चों के व्यवहार में बदलाव होने पर उसे नजरअंदाज न करें। म्यूजिक थैरेपिस्ट दिलीप मणि के मुताबिक, संगीत की मदद से बच्चों को काफी हद तक राहत दी जा सकती है। ऐसे बच्चों के लिए खास तरह का म्यूजिक तैयार कर सुनाया जाता है। जो उनके बिहेवियर, खानपान और आदतों में बदलाव लाता है। कई बार बच्चों का व्यवहार आक्रामक होने या नींद न आने पर अलग-अलग रागों पर आधारित संगीत सुनाया जाता है, जो उन्हें राहत पहुंचाता है।

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