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माइक्रोसॉफ्ट प्रोजेक्ट 'बाली' पर काम कर रहा, इससे यूजर को अपने डेटा पर कंट्रोल मिलेगा



गैजेट डेस्क. आज की तारीख में मोबाइल और कम्प्यूटर इस्तेमाल करने वाले लोगों के डेटा की सुरक्षा बड़ा मुद्दा है। सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों के साथ कई तरह के एप पर यूजर का डेटा चुराने और अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने के आरोप लगते रहते हैं। ऐसे में माइक्रोसॉफ्ट ऐसे प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है जो हर यूजर को उससे जुड़े डेटा पर पूरा कंट्रोल देगा। इस प्रोजेक्ट का नाम बाली रखा गया है। टेक्नोलॉजी के जुड़े पोर्टल जेडडी-नेट ने इसका खुलासा किया है।

प्रोजेक्ट बाली यूजर को इनवर्स प्राइवेसी से बचाएगा

  • प्रोजेक्ट बाली के तहत ऐसा इकोसिस्टम डेवलप किया जा रहा है जो अभी चलन में मौजूद इनवर्स प्राइवेसी से यूजर को बचाएगा। इनवर्स प्राइवेसी का मतलब ऐसे डेटा से है जो हमारे लिए प्राइवेट है लेकिन उन पर हमारा नियंत्रण नहीं होता है।
  • इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि मोबाइल और कम्प्यूटर इस्तेमाल करने के साथ-साथ, वर्क प्लेस, शॉपिंग सेंटर, अस्पताल आदि में हमारी डिजिटल गतिविधियों से कई तरह के डेटा जेनरेट होते हैं। ये डेटा काम करने के हमारे तरीके, शॉपिंग की पसंद, दवाओं की जरूरत आदि से जुड़े होते हैं।
  • कोई कंपनी इन डेटा की मदद से यूजर के मुताबिक पर्सनलाइज्ड और कस्टमाइज्ड प्रोडक्ट तैयार कर सकती है। प्रोजेक्ट बाली यूजर को उसके डेटा पर इतना कंट्रोल देगा कि वह इसे खुद मैनेज और शेयर कर सके। साथ ही यूजर अपने डेटा को मोनेटाइज भी कर सकता है। यानी वह चाहे तो इसे खुद बेच सकता है।
  • इनवर्स प्राइवेसी पर सबसे पहले 2014 में यूरी गुरेविच, एफिम हुडिस और जेनाटे विंग ने 2014 में एक रिसर्च पेपर जारी किया था। ये तीनों उस समय माइक्रोसॉफ्ट में काम कर रहे थे। इन तीनों ने माइक्रोसॉफ्ट में इस प्रोजेक्ट पर काम चलने की बात स्वीकार की है।

दुनिया में 2.5 अरब जीबी डेटा रोज जेनरेट होता है
आज की तारीख में रोजाना 2.5 अरब जीबी डेटा जेनरेट होता है। अब तक जितने डेटा जेनरेट हुए हैं उसका 90% पिछले तीन साल में जेनरेट हुए हैं। दुनियाभर की कंपनियां अपने प्रोडक्ट या सर्विस को बेहतर बनाने के लिए यूजर्स के डेटा की तलाश में रहती हैं। इसके लिए वे बड़ी राशि भी खर्च करती हैं।

कंटेंट मोनेटाइजेशन के बाद अब डेटा मोनेटाइजेशन की बारी आएगी

  • अभी गूगल, फेसबुक और यूसी जैसी कंपनियां यूजर को कंटेंट मोनेटाइजेशन का विकल्प देती हैं। इन कंपनियों के अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर यूजर कंटेंट जेनरेट करता है और उसे उस पर आने वाले विज्ञापन की रकम में हिस्सेदारी मिलती है।
  • इसे ऐसे समझा जा सकता है- अगर कोई यूट्ब पर कंटेंट जेनरेट करता है तो गूगल एडसेंस के तहत उस कंटेंट पर विज्ञापन आते हैं। गूगल उस चैनल पर विज्ञापन के जरिए होने वाली आय का करीब 45% खुद रखता है और 55% यूजर को देता है।

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