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लोकसभा में अब तक का सबसे ज्यादा 132% कामकाज, कई बिलों का विरोध फिर भी 35 दिन में 26 बिल पास



संसद के मौजूदा सत्र में अब तक कुल 37 बिल पेश किए जा चुके हैं। शुक्रवार को आतंकवाद निरोधी कानून (अनलॉफुल एक्टिविटी प्रिवेंशन एक्ट) संशोधन बिल (यूएपीए) पास होने के साथ, दोनों सदनों में पारित कुल बिलों की संख्या 26 हो गई है। इतनी संख्या में बिल पास होने और देर रात तक चल रही संसद की कार्यवाही को देखते हुए, इस बजट सत्र को अबतक के सबसे सफल लोकसभा सत्रों में से एक माना जा रहा है।

इस सत्र में अब तक लोकसभा की कामकाज करने की दर (प्रोडक्टिविटी) 132 फीसदी रही है, जो कि अब तक के इतिहास में सबसे ज्यादा मानी जा रही है। कम से कम पिछले 20 वर्षों में तो यह सबसे ज्यादा प्रोडक्टिविटी है ही। सरकार जहां इसे अपनी उपलब्धि मान रही है, वहीं विपक्ष का मानना है कि सरकार बिल पास करवाने में जल्दबाजी कर रही है। नियमानुसार दोनों सदनों में पारित होने से पहले बिल को संसद की सिलेक्ट कमेटी को भेजा जाना चाहिए। लेकिन इस सत्र में अब तक एक भी बिल संसदीय समिति को नहीं भेजा गया है। एेसा न करने का विरोध हो रहा है।

खासतौर पर इन चार बिलों के संदर्भ में- सूचना का अधिकार (संशोधन), नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी (संशोधन), यूएपीए और नेशनल मेडिकल कमीशन बिल। इन सभी बिलों को लेकर विवाद जारी है और विपक्ष इन्हें संसदीय समिति को भेजने की मांग कर रहा है। वहीं सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के जानकार विराग गुप्ता कहते हैं कि ये बिल पास कर सरकार कानून बनाने को लेकर अपनी गंभीरता दर्शा रही है। हालांकि जब भी सख्त कानून बनता है तो उसके दुरुपयोग की आशंका तो रहती ही है। इसके लिए कानूनी प्रक्रिया दोषी होती है, न कि कानून।

इस बजट सत्र के चार सबसे अहम बिलों के बारे में वो सबकुछ जो आपको जानना चाहिए

1). सूचना का अधिकार (संशोधन) अधिनियम

2005 में आए सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत आम नागरिक आवेदन देकर सरकारी संस्थानों, दफ्तरों आदि से कोई भी जानकारी मांग सकता है। इसमें उनके किए गए कार्यों, खर्चों और काम करने के तरीकों तक की जानकारियां शामिल हैं। अधिनियम का उद्देश्य पारदर्शिता लाना और भ्रष्टाचार पर लगाम कसना है। की जानकारियां शामिल हैं। एक अनुमान के मुताबिक देश में हर साल करीब 60 लाख आरटीआई दाखिल की जाती है।

क्या बदला है?

  • पहले:मुख्य सूचना आयुक्त, सूचना आयुक्त, राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्तों का कार्यकाल पांच साल के लिए होता है।
  • अब:धारा 13, 16 और 27 में बदलाव किया गया है। इनके मुताबिक अब सूचना आयुक्तों का कार्यकाल केंद्र सरकार तय करेगी।
  • पहले:आरटीआई एक्ट की धारा 16 के तहत मुख्य सूचना आयुक्तों का वेतन, मुख्य निर्वाचन आयुक्तों के बराबर होगा।
  • अब:संशोधित कानून के मुताबिक मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की सैलरी केंद्र सरकार तय कर सकेगी।

विरोध किसलिए?
विपक्ष का मानना है कि सरकार सूचना आयुक्तों की स्वायत्तता कम करना चाहती है। इससे सूचना का अधिकार अधिनियम कमजोर पड़ेगा। सरकार अपनी मर्जी से आयुक्तों का कार्यकाल खत्म कर सकती है। इससे आयुक्त पहले की तरह खुलकर काम नहीं कर पाएंगे। सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता विराग गुप्ता भी कहते हैं कि आरटीआई से जो पारदर्शिता की शुरुआत हुई थी, वह अब उल्टी दिशा में जाएगी। ऐसे संशोधन विकेंद्रीकरण के खिलाफ जाते हैं, जोकि लंबे समय में लोकतंत्र के नुकसानदेह साबित हो सकते हैं। वहीं सरकार का तर्क है कि निर्वाचन आयोग और राज्य सूचना आयोग अलग-अलग तरह के काम करते हैं, इसलिए उनकी सेवा शर्तें एक-सी नहीं हो सकतीं।

2).एनआईए और यूएपीए में संशोधन के बिल
नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) का उद्देश्य देश में आतंकवाद का मुकाबला करना है। एनआईए बिल, 2009 के तहत एजेंसी को देशभर में बम धमाकों, हाइजैक और देश की अखंडता को खतरा पहुंचाने वाले मामलों की जांच का अधिकार दिया गया। वहीं 1967 में लाए गए विधि विरुद्ध क्रियाकलाप बिल (यूएपीए) का उद्देश्य देश की एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचाने वाली गैर-कानूनी गतविधियों पर लगाम कसना है।

क्या बदला है?

  • पहले:एनआईए परमाणु ऊर्जा अधिनियम व यूएपीए से जुड़े अपराधों की जांच करती थी। स्पेशल कोर्ट बनाने में बहुत वक्त लगता था।
  • अब:एनआईए साइबर आतंकवाद, मानव तस्करी, फेक करेंसी, प्रतिबंधित हथियार बनाने-बेचने के मामलों में जांच कर सकेगी। देश के बाहर जांच के अधिकार मिलेंगे। सरकार सेशंस कोर्ट को ही स्पेशल कोर्ट में बदल सकेगी।
  • पहले:यूएपीए के तहत सरकार आतंकी गतिविधि या उसमें मदद करने वाले संगठन को ही आतंकी संगठन घोषित कर सकती थी।
  • अब:सरकार इसी आधार पर किसी व्यक्ति विशेष को भी आतंकवादी घोषित कर सकेगी।

विरोध किसलिए?
एनआईए संशोधन विधेयक ने एजेंसी की शक्तियों को बढ़ा दिया है। विपक्ष का मानना है कि सरकार इसका दुरुपयोग कर सकती है। यह भी कहा जा रहा है कि यह संशोधन इसलिए भी नहीं होना चाहिए क्योंकि एनआईए की संवैधानिक वैधता को पहले ही कई अदालतों में चुनौती दी जा चुकी है। वहीं यूएपीए के संशोधन में किसी व्यक्ति को आतंकी घोषित करने के सरकार को मिले अधिकार का सबसे ज्यादा विरोध हो रहा है। विपक्ष का कहना है कि बिल में ‘आतंकवादी’ की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है। यह नहीं बताया गया है कि जांच के किस स्तर पर किसी व्यक्ति को आतंकवादी घोषित किया जा सकता है। यूएपीए के संशोधनों से एनआईए और भी मजबूत हो जाएगी।

3). नेशनल मेडिकल कमीशन बिल
इस बिल को केंद्र सरकार इंडियन मेडिकल काउंसिल (आईएमसी) एक्ट, 1956 को खत्म करने के लिए लाई है। आईएमसी अभी देश में मेडिकल एजुकेशन, मेडिकल संस्थानों और डॉक्टरों के रजिस्ट्रेशन आदि से जुड़ी जिम्मेदारियां संभालती है। अब इस काउंसिल की जगह नेशनल मेडिकल कमीशन बिल के तहत राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) बनाया जाएगा।

नए बिल में क्या है?

  • नेशनल मेडिकल कमीशन मेडिकल कॉलेजों का आंकलन करने, उन्हें मान्यता देने, एमबीबीएस एंट्रेंस और एग्जिट एग्जाम करवाने और मेडिकल कॉलेजों की फीस तय करने का काम करेगा।
  • कमीशन का उद्देश्य मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना, इसे सस्ता करना और देशभर में अच्छे मेडिकल प्रोफेशनल्स की उपलब्धता बढ़ाना भी है। यानी मेडिकल सेवाओं से संबंधित सभी नीतियां नेशनल मेडिकल कमीशन ही बनाएगा।
  • कमीशन में कुल 25 सदस्य होंगे। इनमें से 20 को सरकार नियुक्त करेगी।

विरोध किसलिए?
इस बिल का इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, छात्र और डॉक्टर विरोध कर रहे हैं। सबसे ज्यादा विरोध इसकी धारा 32 का है, जिसके तहत 3.5 लाख गैर-मेडिकल व्यक्तियों या कम्युनिटी हेल्थ प्रोवाइडर्स को मॉर्डन मेडिसिन से इलाज करने का कुछ समय के लिए लाइसेंस देने का प्रावधान है। इसके अलावा कमीशन एमबीबीएस के अंतिम वर्ष के छात्रों के लिए नेशनल एक्जिट टेस्ट (नेक्स्ट) करवाएगा, जिसे पास करने के बाद ही पोस्ट ग्रेजुएशन करने और इलाज करने के लिए लाइसेंस मिलेगा। इसका भी विरोध किया जा रहा है। कमीशन के 25 सदस्यों में से केवल 5 व्यक्तियों के लिए ही चुनाव होगा। यानी बाकी सदस्य या तो सरकारी अधिकारी होंगे और वे जिन्हें सरकार तय करेगी।

इस सत्र में दोनों सदनों ने कितना काम किया?
संसद का मौजूदा सत्र पिछले 20 साल में सबसे ज्यादा काम करने वाला सत्र माना जा रहा है। काम करने के घंटों और पास होने वाले बिलों की संख्या, दोनों के लिहाज से यह सत्र कई रिकॉर्ड कायम कर रहा है।

लोकसभा के पहले सत्रों में कामकाज की स्थिति

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कामकाज की स्थिति (प्रोडक्टिविटी) का अर्थ है जितने घंटे काम करना चाहिए उसके मुकाबले कितना काम किया गया।

पहले सत्र में कितने बिल

वर्ष पास हुए बिल संसदीय समिति कोभेजे गए बिल (%)
2019 28 0
2014 12 26
2009 8 71
2004 6 60

इस सत्र में राज्यसभा में काम की दर:100%
राज्यसभा का यह 249वां सत्र है। अभी कुछ और विधेयकों के पारित होने की उम्मीद की जा रही है। यह सबसे ज्यादा काम करने वाले सत्रों में से एक हो सकता है। राज्यसभा का अब तक सबसे ज्यादा काम करने वाला सत्र 9वां सत्र था, जिसने रिकॉर्ड 50 बिल पास किए थे।

  • इस सत्र में पेश कुल बिल- 37 (लोकसभा में 32, राज्यसभा में 5)
  • दोनों सदनों में पास हुए बिल- 26
  • लोकसभा में पास हुए बिल- 28
  • पेंडिंग बिल- 10

स्रोत: पीआरएस इंडिया और विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स।

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