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लोक साहित्य और गीत-संगीत काे बचाने के लिए दस्तावेजीकरण होना जरूरी : प्रो. राजबीर




लोक साहित्य, लोक प्रदर्शन कला तथा लोक संस्कृति के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयासों की जरूरत है। लोक संस्कृति को जन-जन में जीवंत रखने के लिए सतत प्रयास की आवश्यकता है। ये विचार गुरुवार को एमडीयू के सूर्यकवि पं लख्मी चंद शोध पीठ व छात्र कल्याण कार्यालय व स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ परफार्मिंग एंड विजुअल आर्ट्स की ओर से आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में विद्वानों व लोक संस्कृति विशेषज्ञों ने व्यक्त किए। एमडीयू के कुलपति प्रो. राजबीर सिंह ने इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ किया। एमडीयू कुलपति प्रो. राजबीर सिंह ने कहा कि लोक साहित्य व लोक गीत-संगीत का दस्तावेजीकरण जरूरी है ताकि ये विलुप्त न हो पाए। उन्होंने कहा कि शिक्षण संस्थानों, विशेष रूप से विश्वविद्यालयों की लोक साहित्य तथा संस्कृति को प्रोत्साहन देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

रोहतक की एमडीयू में राष्ट्रीय संगोष्ठी में लोक संस्कृति विशेषज्ञ बैठक करते हुए।

किस्से-रागिनियों की परफॉर्मेंस से एमडीयू में स्टूडेंट्स ने जाना ठेठ हरियाणवी कल्चर

बैंजो, घड़ा, ढोलक, बीन, नगाड़े की धुन पर ऑडिटोरियम में लोकगीत गाते कलाकार। आर्टिस्ट रामफल सुई मुंह में रखकर रागनी गाते। मौका रहा सुपवा ऑडिटोरियम में हरियाणा परफॉर्मिंग आर्ट की कल्चरल इवनिंग का। इंवेंट को होस्ट रामफल चहल ने किया। सुपवा और एमडीयू के वीसी प्रो. राजबीर सिंह चीफ गेस्ट रहे। कोली भर कै सेठ जी आज बारह बरस में फेर मिले… की तर्ज से सेठ तारा चंद की 200 रुपए में अपना बेटा गिरवी रखने की कथा सुनाई। कलाकार गुलाब सिंह ने बहरे तबील किस्से से कदै-कदै में राज करुं था आज मुजरिम बना गलियारे म्ह रागिनी सुनाई। स्टेज परफॉर्मेंस से स्टूडेंट्स ने हरियाणवी कला संस्कृति के आल्हा छंद, सवईया और चमोला के बारे में जाना।

प्रोत्साहन को नई दिशा मिलेगी

एमडीयू के पं लख्मी चंद शोध पीठ के अध्यक्ष प्रो. जयवीर सिंह हुड्डा ने कहा कि इस संगोष्ठी के जरिए हरियाणा की लोक साहित्य व लोक प्रदर्शन कला के संरक्षण और प्रोत्साहन को नई दिशा मिलेगी। इस दौरान संस्कृति विशेषज्ञ प्रो. सुधीर शर्मा, डॉ. जगबीर राठी, डॉ. कैलाश वर्मा, डॉ. रमाकांत शर्मा, आकाशवाणी के पूर्व निदेशक धर्मपाल मलिक, डॉ. सतीश कश्यप, डॉ. राजेश कुमार, प्रो. सुनीत मुखर्जी, डॉ. नरेश वत्स, जनार्दन शर्मा आदि थे।

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