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सजा के तौर पर शुरू हुई थी दही-चिवड़ा खाने की परंपरा



हेल्थ डेस्क. ऐसे समय जबकि हर कोई रेडी टू इट ब्रेकफास्ट को पसंद कर रहा है, एक नाश्ता ऐसा भी है जो न केवल फटाफट बन जाता है, बल्कि प्रोसेस्ड न होने के कारण हेल्दी भी है। यह आज भी पारंपरिक तौर पर खासकर बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश और बंगाल में रोजाना कई घरों में खाया जाता है। शेफ हरपाल सिंह सोखी आज बात कर रहे हैं दही-चिवड़ा (दही-चूड़ा) और उससे जुड़ी एक कथा की।

  1. इसे दुनिया का सबसे आसान नाश्ता भी कहा जा सकता है। इसके लिए बस पोहा या चिवड़ा लेना है। उसे साफ पानी में धोकर उस पर थोड़ा-सा दही मिला लेना है। अब अपनी पसंद के अनुसार इसमें शक्कर या गुड़ मिला लें। बस दही-चिवड़ा तैयार है। कुछ लोग इसमें केले की स्लाइस भी मिला लेते हैं। इससे यह और अधिक हेल्दी बन जाता है। डॉक्टर्स भी कहते हैं कि अगर आप सुबह अपने पहले मील के रूप में दही-चिवड़ा खाते हैं तो यह न केवल आपको दिनभर के लिए स्फूर्ति देगा, बल्कि आपका पाचन भी दुरुस्त रखेगा।

  2. बहुत ही लो-कैलोरी फूड होने के कारण आप इसे जितना चाहे, उतना खा सकते हैं। दक्षिण भारत खासकर कर्नाटक में भी इसे बनाया जाता है। वहां इसे ‘मोसरू अवलक्की’ कहते हैं। हालांकि वहां इसे बनाने का तरीका थोड़ा अलग है और इसे कर्ड राइस जैसा बनाया जाता है। हींग, हरी मिर्च, उड़द दाल और चना दाल के साथ इसमें तड़का भी लगाया जाता है।

  3. अब दही-चिवड़ा से जुड़ी एक कथा भी जान लेते हैं। रघुनाथदास गोस्वामी बंगाल में रहते थे। वे बहुत छोटी उम्र में ही सबकुछ छोड़कर ईश्वर भक्ति में ही लीन हो जाना चाहते थे और इसके लिए श्री चैतन्य महाप्रभु की शरण में जाना चाहते थे। लेकिन उनके पिता गोवर्धनदास बड़े जमींदार थे और इसलिए उन्होंने अपने बेटे को इसकी अनुमति नहीं दी।

  4. दो साल बाद चैतन्य महाप्रभु के शिष्य नित्यानंद प्रभु पानीहटी कस्बे में आए। रघुनाथ पास ही के एक गांव में रहते थे। जब उन्हें चैतन्य महाप्रभु के बारे में पता चला तो उन्होंने अपने पिता से उनसे मिलने की अनुमति मांगी। पिता ने मुलाकात करने की अनुमति दे दी। रघुनाथदास पानीहटी कस्बे में पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि नित्यानंद प्रभु गंगा नदी के किनारे बरगद के पेड़ के नीचे एक पत्थर पर बैठकर अपने शिष्यों को प्रवचन दे रहे हैं।

  5. रघुनाथदास की नित्यानंद प्रभु के पास जाने की हिम्मत नहीं हुई और वे दूर से ही पेड़ की आड़ में खड़े होकर उन्हें सुनने लगे। उसी समय कुछ शिष्यों की नजर रघुनाथ पर पड़ गई। उन्होंने इस बारे में नित्यानंद प्रभु को सूचित किया। नित्यानंद प्रभु ने रघुनाथ से कहा, ‘तुम मुझे चोरों की तरह छिप-छिपकर सुन रहे थे, पर रंगे हाथों पकड़े गए। तुम इधर आओ। तुम्हें मैं सजा दूंगा।’इसके बाद नित्यानंद प्रभु ने रघुनाथ को सजा के तौर पर उनके सभी भक्तों के बीच दही और चिवड़ा का प्रसाद बांटने का आदेश दिया।

  6. रघुनाथ ने तुरंत उनके आदेश की पालना की। उन्होंने बड़े पैमाने पर दही-चिवड़ा बनवाया और महोत्सव के रूप में सारे भक्तों के बीच वितरित करवाया। इसी की याद में हर साल पानीहटी में ज्येष्ठ माह के तेरहवें दिन चिवड़ा-दही महोत्सव मनाया जाता है। इस साल यह महोत्सव 15 जून को मनाया जाएगा।इस तरह इस कथा से पता चलता है कि चिवड़ा-दही खाने की परंपरा पश्चिम बंगाल से शुरू हुई और वहां से बिहार, झारखंड और उत्तरप्रदेश तक पहुंची।

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      Food history by Chef Harpal singh Sokhi- Story of Dahi Chivda

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