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गजब: गरीब किसान के टेली ऑपरेटर बेटे ने IIT से लेकर AIIMS तक से ली डिग्री, जापान जाकर कैंसर पर कर डाली रिसर्च



कानपुर। ये कहानी पश्‍चिम बंगाल के बुधुपुरा से ताल्‍लुक रखने वाले 26 साल केशोवेन आचार्य की है। वे एक किसान परिवार से ताल्‍लुक रखते हैं। बचपन में कैंसर की वजह से ताई की असमय मौत से शोवेन को बहुत दुख हुआ। इसके बाद उन्‍होंने ठान लिया था कि वो कैंसर जैसी बीमारी से लड़ेंगे। इसी संबंध में वे पहले IIT कानपुर और अब जापान से रिसर्च करके लौटे हैं। शोवेन फिलहाल बतौर सीनियर रिसर्च फैलो कैंसर जैसी बीमारी से लड़ने में जुटे हैं।

पल भर में बदल गया बचपन

– शोवेन ने एक इंटरव्यू में बताया था कि जब वे सातवीं क्लास में थे, तब पढ़ाई में मन नहीं लगता था। मगर तभी एक दिन बड़ी मम्‍मी यानी कि ताई की तबियत खराब हो गई। उन्हें आखिरी स्टेज वाला ब्‍लड कैंसर था।
– कुछ ही दिनों में उनकी मौत हो गई। बड़ी मम्‍मी की मौत ने उनके दिमाग गहरा असर किया। परेशान रहने लगे। सोचने लगे की पल भर में जिंदगी छीन लेने वाली इस बीमारी से कैसे लड़ें। तब तय किया कि कैंसर के मर्ज पर कुछ करना है।

पढ़ाई के लिए नहीं थे पैसे

– शोवेन बताते हैं- इस घटना के बाद मैं अच्छे से पढ़ाई करने लगा। दसवीं और बारहवीं में अच्‍छे नंबर मिले। मगर इसके बाद की पढ़ाई के लिए मेरे पापा के पास पैसे नहीं थे।
– इसलिए मैंने कोलकाता आकर नौकरी करने का निर्णय लिया। इसके लिए मम्‍मी-पापा भी कुछ दिनों बाद मान गए।
– कोलकाता में एक हॉस्पिटल में एक रिसेपशनिस्‍ट की जॉब शुरू कर दी। जॉब के साथ डॉक्‍टरों से पूछता रहता था कि कौन सी बीमारी किस वजह से हो जाती है?

इंटरनेट पर करते सर्च, वीडियो देखते

– उन्होंने बताया कि जब भी डॉक्‍टर किसी का इलाज करते। कुछ लिखते, मरीजों से कुछ पूछते हर चीज को बहुत गौर से सुनता था। डायरी में नोट कर लेता था। खासतौर पर कैंसर से संबंधित।
– घर पर हर छोटी-मोटी बड़ी बातों को इंटरनेट पर सर्च करता। यूट्यूब पर वीडियो देखता। इस तरह से मैं कुछ बातें जानने लगा था।

नॉलेज देख हैरान रह गए डॉक्टर

– उन्होंने बताया कि एक वक्‍त ऐसा आया जब मेरी नॉलेज देखकर डॉक्‍टर्स भी दंग रह गए थे। उन्‍होंने भी सोचा कि एक रिसेप्‍शनिस्‍ट को इतनी बारीक नॉलेज कैसे है? इसके बाद वो मेरे सवालों के जवाब देने लगे थे।
– लेकिन ये नौकरी छोड़कर टाटा कैंसर हॉस्‍पटिल में टेलीफोन ऑपरेटर बन गया। यहां भी यही करता था। डॉक्‍टरों से खूब पूछता, यहां के डॉक्‍टर मुझे बताने लगे थे।

पढ़ाई में हो गया था दो साल का गैप

– हॉस्पिटल में काम करते हुए नॉलेज तो बढ़ी, पर पढ़ाई में दो साल का गैप हो गया। ऐसे में कोलकाता यूनिवर्सिटी में नियम के अनुसार एडमिशन नहीं मिल सकता था।
– तब जॉब छोड़कर बीएससी में एडमिशन के लिए कानपुर आया। हालांकि यहां 65 हजार रुपए फीस थी। तब पापा ने कुछ खेत बेचकर मुझे पैसे दिए।

ऐसे शुरू हुआ कैंसर पर रिसर्च का सफर

– कानपुर यूनिवर्सिटी से पैरामेडिकल साइंस में एडमिशन ले लिया। पढ़ने के साथ काकादेव की कोचिंग में बॉयोलाजी की क्‍लास लेने लगा। हालांकि पहले टीचर जॉब पर रखने को तैयार नहीं था। बाद में आदर्श सर मेरी नॉलेज देखकर मान गए। हालांकि अब भी लक्ष्‍य से दूर था।
– इसके बाद आईआईटी के बॉयोटेक्‍नोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. प्रदीप सिन्हा को अप्रोच किया। वे मुझे रिसर्च कराने के लिए तैयार हो गए।
– उनके साथ कैंसर के उस सब्‍जेक्‍ट पर काम करने लगा। प्रोफेसर सिन्‍हा कैंसर की उस सेल्‍स पर काम कर रहे थे, जिसमें ये पता लगाया जाता है कि एक सर्जरी के बाद दोबारा कैंसर कैसे हो जाता है।

AIIMS से ली मास्टर्स की डिग्री, जापान गए

– शोवेन ने बताया कि इसके बाद उन्होंने दिल्‍ली के ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस में मास्‍टर डिग्री के लिए अप्लाई किया। मेरा सेलेक्‍शन हो गया। इस दौरान दिल्‍ली में मिनस्‍ट्री साइंस ऑफ फैलोशिप का फॉर्म भरा।
– अप्‍लाई करने पर मेरा सेलेक्‍शन हुआ और छह महीने के लिए जापान चला गया। वहां रिसर्च के बाद पश्‍चिम बंगाल के कल्‍याणी शहर में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल जेनोमिक में सीनियर रिसर्च फैलो कर रहा हूं।

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