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अंधा कानून या अंधे हम – भरमाते हैं पहरेदार

शालिनी सिंह
एंकर-ऑल इंडिया रेडियो लखनऊ व स्वतंत्र लेखिका

दोस्तो ! स्त्री पुरुष की समानता के अधिकार और उनकी स्वतंत्रता ,सुरक्षा , के लिए बहुत सारे नियम कानून तैयार किये गए और बहुत सहूलियत भी मिली। पितृसत्तात्मक समाज में घरेलू हिंसा की प्रवृत्ति को रोकने के लिए इस तरह के कानून की बहुत आवश्यकता थी भी। महिलाओं की सुरक्षा के लिए आज भी कानून की उपयोगिता है लेकिन कानून का दुरुपयोग भी हो रहा है इस बात से नकारा नहीं जा सकता। महिलाएं सशक्त हुई हैं ,मुखर हुई हैं घर की दहलीज को पार करके कीर्तिमान गढ़ रही हैं किंतु महिलाएं शातिर हुई हैं , अपराध को अंजाम देती हैं ,बलात्कार करती हैं,शोषण करती हैं ,कानून को गुमराह करती हैं ….इस पहलू से भी इंकार नहीं किया जा सकता। समाज में स्त्री और पुरुष के दोनों ही पहलू अब लगभग समान रूप से देखने को मिलते हैं ….. होना भी चाहिए आख़िर  कंधे से कंधा मिलाने की बात जब हो तो हर क्षेत्र में स्वीकार्यता होनी ही चाहिए।

आज इन सभी बातों के साथ एक और बहुत बड़ा पहलू, जिस पर सबका ध्यान आकर्षित करना चाहती हूं …….हो सकता है कि मुझे कानून की धाराओं की जानकारी बहुत बारीकियों से न हो पर हित अहित समझने और वक़्त की क़ीमत समझने भर की तो है …..आज पारिवारिक न्यायालय से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक अनगिनत मामले होंगे जिसमें स्त्री पुरुष आपस में अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा है सिर्फ अपनी ज़िंदगी मे कुछ पल सुख ,शान्तिं,सुकून और सुरक्षा के साथ जीने की ख़ातिर।  इस कुछ पल की ख़ातिर न जाने कितनी मनोदशाओं से होकर गुजरते हुए वकील के चेम्बर से लेकर कोर्ट के कटघरे में न्याय पाने तक दशक बीत जाते हैं और कई बार जिंदगी ही बीत जाती है और अंततः हम सोचते हैं कि हम कैसे इतना उलझ गए …… कारण और वजहें भी बहुत हैं असँख्य केसों की तरह जिन्हें सुलझा पाना  किसी एक के बस का नहीं ………क्योंकि ये सामाजिक और कानूनी ताना बाना बेहद उलझ गया है और सच कहूँ तो उलझ गए हैं हम सभी। वैसे सामाजिक चक्रव्यूह तो बनते टूटते रहेंगे लेकिन क़ानूनी पैरोकार ,सलाहकार, विशेषज्ञ की बहुत बड़ी भूमिका है कि वो कानून की विसंगतियों को सहजता के साथ परोस कर कानून तैयार किये जाने के सही उद्देश्य व उपयोगिता से गुमराह न करें।

जी हां दोस्तों मैं न कोई वकील हूँ न पूर्ण पत्रकार जो किसी भी बात को तोड़ मरोड़कर खुद को विशेष साबित करने की ख़ातिर प्रस्तुत करूँ। मैं एक सामान्य स्त्री हूँ जो परिवार का अर्थ समझती है परिस्थितियों के अनुसार सही गलत का आंकलन कर सकती है और पेशे से एक रेडियो एंकर और लेखक जो मानवीय मूल्यों के साथ ज़मीनी स्तर पर लोगों से जुड़ सके।

आज कोर्ट में क़ानूनन तलाक़ की ख़ातिर न जाने कितने केस फाइलों में दबे पड़े हैं एक दो साल नहीं दशकों से। और याचिका दायर करने वाले याचक कहने को तो तलाकशुदा जीवन के संघर्ष में जी रहे होंगे किंतु तलाक की घोषित प्रतिलिपि उनके हाथ नहीं है जिसके कारण वो  जी तो अपनी मर्जी के अनुसार रहे होंगे लेकिन कानून की नज़रों से बचकर क्योंकि अभी तलाक हो नहीं सका है। इसका बहुत बड़ा कारण हैं हमारे कानूनी सलाहकार और पैरोकार ….. जो  जानबूझकर साल दो साल में निपटने वाले या फिर सुलह हो जाने वाले केस को इस कदर गुमराह करते हैं कि याचक /पीड़ित का समय तो बर्बाद होता ही है साथ ही होता है उसके जीवन का अमूल्य क्षण जो कभी लौट कर नहीं आ सकता। बर्बाद होता है हमारी न्यायपालिका का अमूल्य समय जो किसी और आवश्यक मुद्दे पर गम्भीरता से दिया जाना आवश्यक हो सकता है। पीड़ित को देर सबेर जब इंसाफ मिलता है तब तक ख़त्म हो चुकी होती है फिर से नए सपने देखने की आस, हिम्मत ,ताकत और इच्छा ……. मिलती है सामाजिक आलोचना, निराशा, भय, हार और एकांकीपन के साथ अवसाद की गोलियों के रूप में अपनों की सहानुभूति।

कहने और सुनने में बुरा लगता हैं किंतु सच भी है कि हमारे वकील वर्ग का एक बड़ा जनसमूह अप्रत्यक्ष रूप से नकारात्मक ऊर्जा से कमाई हुई रोटियां खाता है और कानून की व्यवस्था को नकारात्मकता के अन्धकार में अपने काले रंग के कोट की तरह लपेट रहा है धीरे धीरे , जबकि प्रयास  करना है काले आवरण को हटाकर भीतर के सफेद आवरण को प्रत्यक्ष और पारदर्शिता के साथ सामने लाने का।

एक साधारण से केस को जो महज काउंसलिंग से रफा दफा हो सकता है  उसमें बदले की भावना को हवा देने से लेकर   समानता और स्वतंत्रता की स्वार्थ भरी परिभाषा समझाकर पूरी कहानी को नए मोड़ पर ला खड़ा करने में अहम भूमिका होती है वकीलों की। ये महज कोरी कल्पना नहीं हकीकत है ….कई केस सुनने देखने को मिलते हैं जिसमे पति पत्नी  और परिवार में सामंजस्य नही होने पर वे कुछ सहूलियत की ख़ातिर ,सलाह मात्र के लिए वकील के पास जाते हैं या फिर शान्ति पूर्वक तलाक लेकर हर रोज की माथापच्ची से पिंड छुड़ाने के लिए वकील का सहारा लेते हैं लेकिन ……..लेकिन यहीं पर शुरू होता है खेल,  चिंगारी को कानूनी भाषा मे हवा देने का। तलाक मिलना कोई लम्बी प्रक्रिया नहीं। कुछ सेशन काउंसलिंग के बाद भी यदि सुलह की कोई गुंजाइश नहीं दिखती तो तलाक को स्वीकृति दी जाती है और यदि दोनों पक्ष इस फैसले पर सोच समझ कर सहमति से तैयार है तो भी अधिक समय नहीं लगता और उसका समय बचता है। किंतु हर पक्ष हर बार समझदार नहीं होते और वकील की सलाह को सर्वोपरि मानते हैं ऐसे में घरेलू हिंसा का केस, जान से मारने की कोशिश का केस, बच्चे पर अधिकार का केस, हर्जे खर्चे का केस, तमाम तरह के केस दर्ज कर विपक्षी को सताने के नाम पर जो षड्यंत्र शुरू होता है उसमें सच और झूठ को साबित करने की असफल कोशिशों और हर पेशी पर हजार पांच सौ की नोट कमाने की लंबी प्रक्रिया में यदि कोई सफर करता है तो वो है पीड़ित का वजूद उसका विश्वास और उसकी आस। जबकि पारिवारिक सामंजस्य नहीं बैठने का मामला जिसमे कोई घरेलू हिंसा नहीं हुई किंतु तलाक के लिए तमाम धाराओं के दुरुपयोग की सलाह एक छलावा मात्र है। जिसके दुष्परिणाम सिर्फ कोर्ट और पीड़ित के समय की बर्बादी के साथ पीड़ित से जुड़े कई अन्य लोगों के जीवन और उनकी मनोदशा पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से देखने को मिलते हैं।

न्याय के लिए न्यायिक प्रक्रिया इतनी उलझी हुई नहीं है जितनी इसके पैरोकारों ने कर दी है।  और ये समस्या सिर्फ तलाक़ जैसे मुद्दों के साथ नहीं है ।हर तरह के केस में यही हाल है। बेवजह के झूठे आरोप और फिर उन्हें साबित करने के लिए साक्ष्य जुटाने में न जाने कितना वक़्त बीत जाता है। रोजी रोटी की ख़ातिर गुमराह किये जाने के इस रास्ते पर न जाने कितने वकील वकालत करते मिलेंगे और अफ़सोस उनके यही पैंतरे उनके खुद के मुश्किल हालातों में नहीं लागू होते क्योंकि उन्हें खुद के वक़्त की कीमत पता होती है। आज अधिकारों के प्रति हम जागरूक हो रहे हैं  रिश्तों की हर बुनियाद पर जुड़ती ईंट पर कानून की ज़रूरत नहीं महसूस करते किंतु रिश्तों की इसी बुनियाद की चूलें हिलने पर कानून के अलावा कोई मजबूत स्तम्भ नज़र भी नहीं आता। रिश्तों की शुरुआत तो जज़्बातों से होती है पर खत्म झूठ ,फरेब और कानून के कटघरे में खड़े हुए बिना मुश्किल दिखती है। ऐसे में बेहद ज़रूरी है कि हम जागरूक हों कि हमारे कानूनी सलाहकार हमें भटकाव की दिशा में न ले जा सकें। हम विरोध करें उन झूठी दर्ज हुई धाराओं के जो घटना हमारे साथ घटित नहीं हुई।  ऐसा करके हम कोर्ट के वक़्त के साथ अपना पैसा और जीवन का बहुमूल्य समय बचा सकेंगे साथ ही देश की न्यायपालिका का बोझ हल्का कर सहयोगी बन सकेंगे देश हित के लिए ताकि न्यायपालिका की रफ्तार जो अत्यधिक बोझ से धीमी हो गई है वह तेज़ हो सके और वक़्त रहते न्यायाश्रित लोगों की राह तकती आंखों में उम्मीद की चमक बरकरार रहा सके।

साथ ही एक अपील काले कोटधारी  दोस्तों से कि वे अपने कोट के भीतर की जो सफेद शर्ट उनके बदन से लिपटी है सत्य की तरह, उसे महसूस करें और कानून के काले रंग को नहीं उसकी पारदर्शिता के सफेद रंग को अपनी पहचान बनाएं ताकि हमारी न्याय व्यवस्था विश्वास की निर्मल स्याही की तरह हम सबके मन में  सत्य की जीत, आशाओं के दीप को सचित्र स्थापित कर सके।

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One comment

  1. किस कानून की बात कर रही हैं आप? उस कानून कि जिसकी नेतागण धज्जियाँ उड़ाते हैं। उस कानून की जो आतंकियों की खातिर रात को 12 बजे भी उपलब्ध रहता है और सामान्य व्यक्ति उसकी चौखट पर न्याय माँगते-माँगते दम तोड़ देता है। उस न्याय की बात करती हैं, जहाँ एक निर्दोष को भी सच को वकीलों के कहे अनुसार बोला जाता हो। या उस कानून की जो आम और ख़ास में भेद करता है। अस्पृश्यता का अंत करने वाला कानून ख़ुद ही आम आदमी से अस्पृश्य सा व्यवहार करता है।मेरे पिताजी कहा करते थे कि लोगों की दो बात बर्दाश्त कर जाओ, लेकिन कानून के चक्कर में मत पड़ो। अब मुझे मालूम हुआ कि वो बिल्कुल सत्य कहते थे। आज क़ानून के हाथ लंबे हों न हो, न्याय की प्रक्रिया लम्बी जरुर हो गई है। और इसके लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया ख़ुद जिम्मेदार है।

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