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गुस्से को बनाई ताकत, पिता की मौत के सदमें से उबरने के लिए 5 साल पहले शुरू की बॉक्सिंग, अब खेलेंगी इंटरनेशनल चैंपियनशिप



  • मंजू ने 2014 में जूनियर स्टेट चैंपियनशिप और जूनियर नेशनल चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीते।
  • 2016 में भी इसी चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल अपने नाम किया।

रोहतकरोहतक की मंजू जब सिर्फ 12 साल की थीं, तब उनके पिता भीमसेन सिंह की कैंसर से मौत हो गई थी। भीमसेन सिंह बीएसएफ में जवान थे। मंजू इस सदमे से उबर नहीं पा रही थीं। इस वजह से वह बहुत गुस्सैल और चिड़चिड़ी हो गई थीं। मंजू ने पिता की मौत के सदमे से उबरने के लिए बॉक्सिंग शुरू की। उसने अपने गुस्से का इस्तेमाल सही जगह करने का फैसला किया।

बॉक्सिंग से उसका कॉन्फिडेंस बढ़ने लगा और उसमें सकारात्मकता आने लगी। मां इशवंती ने भी बेटी को आगे बढ़ने में मदद की। मंजू ने 2014 में बॉक्सिंग में डेब्यू किया। उसने 2014 में जूनियर स्टेट चैंपियनशिप और जूनियर नेशनल चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीते। इसके अगले साल एक बार फिर जूनियर स्टेट चैंपियनशिप में चैंपियन बनी। 2016 में भी इसी चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल अपने नाम किया। मंजू 48 किग्रा वेट कैटेगरी में खेलती हैं।

मंजू ने पिछले साल सीनियर नेशनल चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता। उस दौरान मंजू के साथ काफी भेदभाव भी हुआ। इस कारण उन्होंने सीनियर नेशनल्स में हरियाणा छोड़ पंजाब का प्रतिनिधित्व किया था। अब उनका चयन बुल्गारिया में इस महीने के अंत में होने वाली इंटरनेशनल चैंपियनशिप में हिस्सा लेने वाली भारतीय टीम में हुआ है। यह उनका पहला इंटरनेशनल टूर्नामेंट होगा। टीम 12 फरवरी को बुल्गारिया रवाना होंगी। मंजू के चार भाई-बहन हैं।

मेरीकॉम और विजेंद्र को रॉल मॉडल मानती हैं मंजू
मंजू ओलिंपिक मेडलिस्ट बॉक्सर एमसी मेरीकॉम और विजेंद्र सिंह को अपना रोल मॉडल मानती हैं। मंजू कहती हैं, ‘जैसे मेरीकॉम और विजेंद्र अपने जीवन में आई सारी मुसीबतों का सामना कर आगे बढ़ते गए, मैं भी वैसा ही करना चाहती हूं। मेरा लक्ष्य ओलिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए देश को मेडल दिलाना है।’

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मंजू ने 2014 में बॉक्सिंग में डेब्यू किया।

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