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बेटी की शादी के दिन मां की मौत, छोटी बहन ने मां-बाप बन बारात-स्वागत से लेकर कन्यादान तक की रस्में निभाईं, बहन को विदा करने के कुछ घंटे बाद मां की अर्थी को दिया कांधा



श्रीगंगानगर।बड़ी बेटी आंचल को दुल्हन बना देखने का सपना अधूरा छोड़ स्वर्ग पहुंची मां सुनीता रब से गुजारिश जरूर कर रही होगी कि उनकाे हर जन्म में ऐसी ही बेटियां मिले। मिले भी क्यों न..क्योंकि मां के निधन के बाद छोटी बेटी अंजलि ने मां की मौत और बहन की विदाई का दर्द दिल में ही छिपा अपनी बड़ी बहन की शादी में सारी रस्में निभाई, फिर हंसते-हंसते डोली को विदा भी किया। अगले दिन मां की अंतिम यात्रा में भी शामिल हुई।

दरअसल रामसिंहपुर निवासी वेद प्रकाश बाघला कीदो ही बेटियां हैं। बड़ी बेटी आंचल का शनिवार रात विवाह था। बारात पहुंच चुकी थी। इसी दौरान आंचल की मां सुनीता की अचानक तबीयत बिगड़ गई। बीपी कम होने के कारण उनको वेदप्रकाश सूरतगढ़ लेकर पहुंचे। लेकिन हालत नाजुक हो जाने के कारण तत्काल श्रीगंगानगर रैफर कर दिया। घर पर बेटी दुल्हन बनीं मां-बाप के आशीर्वाद का इंतजार कर रही थी और इधर भगवान को कुछ ओर ही मंजूर था। श्रीगंगानगर के एक निजी अस्पताल में रात को सुनीता का निधन हो गया। उसी समय उनकी बेटी मंडप पर फेरे लेकर नए जीवन की शुरूआत कर रही थी। ऐसे हालातों में वेदप्रकाश घर पर किसी को कहते भी तो क्या। इस घटना का घर के गिने चुने चार-पांच लोगों को ही पता था। सुनीता के निधन की बात इसलिए छुपाई गई ताकि आंचल की शादी में व्यवधान न हो।

रविवार सुबह डोली विदा की, शाम को बेटा बन मां की अर्थी काे कांधा दिया

छोटी बेटी अंजलि ने मां और पिता की मौजूदगी नहीं होने के दुख को अंदर ही दबा लिया और आंसुओं को पीकर बहन के ससुराल के सभी रिश्तेदारों से मिलनी की रस्म निभाई। इसके बाद स्टेज पर जयमाला का आयोजन भी करवाया। फेरों पर कन्यादान भी उसी ने किया। यहां तक की सुबह डोली विदा भी उसी ने ही करवाई।कुछ ही देर में सुनीता का शव भी एंबुलेंस में घर पहुंच गया। रातभर बहन की शादी की खुशियों को मनाने में जुटी अंजली और परिवार के अन्य सदस्यों पर दुखाें का पहाड़टूट पड़ा। शाम को इसी बेटी ने मां की अर्थी को बेटा बन कांधा दिया।

भास्कर के आग्रह पर साहित्यकार संदेश त्यागी ने अपने शब्दों में लिखा…

तुम्हें शत-शत नमन बेटी, तुम्हें हम कुछ कहें कैसे,
सभी अल्फ़ाज़ हैं छोटे, क़लम से प्राण ग़ायब हैं…
तुम्हें अब क्या कहा जाए, फ़क़त इस सोच में सब हैं।
मुक़्क़दर से लड़े देखे, बहादुर कुछ बड़े देखे,
गिरे वो भी खड़े देखे,दुःखों से भी अड़े देखे,
नहीं तुमसा कोई देखा,पलट दे जो सभी लेखा,
बदल डाली है परिभाषा,बनाई है जुदा भाषा,
न जिसमें व्याकरण कोई, न कोई भेद रिश्तों का,
तुम्हीं माँ हो तुम्हीं अब्बा, तुम्हीं छोटी बहिन भी हो, निभाती हो सभी रस्में, विदा डोली को करती हो,
बहिन की माँ जो हो उस पल
मगर अगले ही पल में तुम विदा माँ को भी करती हो,
उसे कंधा भी देती हो।
तुम्हारे आँसुओं को पौंछ पाने का नहीं साहस,
मगर ये जानते हैं सब ,ये मन से मानते हैं सब,
जो तुम हो तो ये दुनिया है, ये रिश्ते हैं, ये जज़्बा है,
जो तुम हो तो मुहब्बत है, खुदा पर इक भरोसा है।
तुम्हें शत शत नमन बेटी, तुम्हें हम कुछ कहें कैसे,
सभी अल्फ़ाज़ हैं छोटे, क़लम से प्राण ग़ायब हैं।
….डाॅ. संदेश त्यागी

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