Wednesday , October 16 2019, 5:49 PM
ब्रेकिंग न्यूज
Hindi News / देश दुनिया / राष्ट्रीय / अयोध्या केस: पूजा, रेलिंग SC के कई सवाल

अयोध्या केस: पूजा, रेलिंग SC के कई सवाल

नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या के राम मंदिर बाबरी मस्जिद जमीन विवाद मामले की सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्षकार के वकील को धमकी वाला लेटर लिखने के मामले में 88 साल के बुजुर्ग ने अपने लेटर के लिए खेद जताया जिसके बाद मामले को बंद कर दिया गया। वहीं सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्षकार के वकील राजीव धवन ने दलील दी कि लोग रेलिंग के पास क्यों जाते थे इस बात का कोई साक्ष्य नहीं है। इस बात का कोई साक्ष्य नहीं है कि लोग बीच वाले गुंबद में पूजा के लिए जाते हों। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि एक गवाह के बयान हैं कि वहां पूजा होती थी। सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक बेंच के सामने मामले की 27 वें दिन सुनवाई हुई। हालांकि चीफ जस्टिस की तबीयत खराब होने के कारण लंच के बाद सुनवाई नहीं हो पाई।

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई: (राजीव धवन को लेटर लिखकर इस केस से दूरी बनाने के लिए कहने वाले 88 साल के तामिलनाडु के प्रोफेसर से) आप क्यों ये सब कर रहे हैं।

राजीव धवन के वकील कपिल सिब्बल: (प्रोफेसर की ओर से खेद जताए जाने के बाद) हम इस मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहते। हम प्रोफेसर के खिलाफ ऐक्शन नहीं चाहते। हम सिर्फ संदेश देना चाहते थे। कोर्ट को मामले का निपटारा करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट: हम इस मामले को खत्म कर रहे हैं। आप ऐसा दोबारा न करें।

अयोध्या:

मुस्लिम पक्षकार के वकील राजीव धवन: मेरा कहना है कि 1949 के केस के बाद ही तमाम गवाह सामने बयान के लिए आए हैं लेकिन किसी गवाह के बयान से जाहिर नहीं होता कि रेलिंग के पास लोग पूजा के लिए क्यों जाते थे। इस बात का किसी को पता नहीं है। (दरअसल बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने सवाल किया था कि राम चबूतरा के पास बने रेलिंग के पास लोग पूजा के लिए क्यों जाते थे?)। गवाह के बयान है कि हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदाय के लोग प्रेयर करते थे। औरंगजेब के समय से ही दोनों समुदाय के लोग वहां प्रार्थना के लिए जाते थे। हिंदू पक्ष के एक गवाह के बयान से साफ है कि बीच वाले गुंबद के नीचे कोई मूर्ति नहीं थी वहां कोई पूजा नहीं होती थी। मूर्ति वहां 1949 में रखी गई।

जस्टिस अशोक भूषण: एक गवाह राम सूरत तिवारी का बयान भी है। उसके बयान में कहा गया है कि जब वह 12 साल के थे तब वह अपने पिता के साथ अयोध्या जाते रहे हैं। 1935 से वह अयोध्या में राम जन्मभूमि स्थल पर पूजा के लिए जाते थे। उसने बयान दिया था कि वहां पूजा होती थी। ऐसे में ये तर्क देना ठीक नहीं होगा कि बीच वाले गुंबद में हिंदुओं की ओर से पूजा किए जाने के सबूत नहीं हैं। आप साक्ष्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश कर रहे हैं। ऐसे साक्ष्य को तोड़ा मरोड़ा नहीं जा सकता। अगर हिंदू पक्षकार ने उस बयान को रेफर नहीं किया इसका मतलब ये नहीं है कि कोर्ट सवाल नहीं पूछ सकता। ये हाई कोर्ट के जजमेंट का पार्ट है इसलिए सवाल है।

अयोध्या:

राजीव धवन: लेकिन इस तरह के बयान विश्वास योग्य नहीं हो सकते।

जस्टिस भूषण: लेकिन गवाह के बयान को कैसे देखा जाए ये तो कोर्ट पर आप छोड़िए।

राजीव धवन: मुझे माई लॉर्ड का अंदाजे बयां थोड़ा सख्त लगा।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़: अदालत इसलिए सवाल पूछती है ताकि चीजों में स्पष्टता रहे। हम आपको बेहतर तरीके से समझें इसलिए भी सवाल होता है।

राजीव धवन: मैं माफी चाहता हूं। (आगे दलील देते हुए) वहां राम चबूतरे का जिक्र है और वहीं लोग पूजा करते थे। 1980 के बाद जन्मभूमि का सिद्धांत सामने आया है। जन्मभूमि और जन्मस्थान उसके बाद का ही कॉन्सेप्ट है। 1885 में तमाम कार्रवाई राम चबूतरा के लिए हुई थी। उस वक्त भगवान राम का जन्मस्थान वहीं बताया गया था। मस्जिद के बीच वाले गुंबद के नीचे के स्थान का जिक्र नहीं था। ऐसा सबूत नहीं है कि लोग रेलिंग के पास पूजा के लिए जाते थे या फिर बीच वाले गुंबद के नीचे पूजा के लिए जाते थे। पूजा सिर्फ बाहरी आंगन में स्थित राम चबूतरे पर होती थी और उसी को जन्मस्थान बताया गया है। 1989 में नेक्स्ट फ्रेंड सामने आए हैं ऐसे में कोर्ट को उनके होने पर सवाल करना चाहिए।

Check Also

सेना का वॉरगेमिंग डिवेलपमेंट सेंटर होगा महू शिफ्ट

नई दिल्ली के लिए युद्ध लड़ने के नए तरीके, उनकी प्रैक्टिस और उनका अैनालेसिस करने …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *