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घातक जरूर है नींद में चलने की बीमारी, इलाज आसान है इसका

हाल ही बॉलिवुड ऐक्ट्रेस ने सोशल मीडिया पर अपनी एक समस्या को शेयर किया था। उनके अनुसार, जब वह सुबह सोकर उठती हैं तो उनके पैरों में चोट जैसे निशान और सूजन होती है और अब वह मानने लगी हैं कि उन्हें है। इलियाना के इस ट्वीट से एक बार फिर लोगों में इस बीमारी को लेकर चर्चा छिड़ गई है। इसलिए हमने मैक्स हॉस्पिटल के कंसल्टेंट सायकाइट्रिस्ट और उद्गम मेंटल हेल्थ केयर ऐंड रिहेबिलिटेशन सेंटर दिल्ली के डायरेक्ट
डॉक्टर राजेश कुमार से इस बीमारी के बारे में हर उस पहलू पर बात की जो आपके लिए जानना जरूरी है…

आमतौर पर बचपन की बीमारी है
सायकाइट्रिस्ट और न्यूरॉलजिस्ट्स के अनुसार, लगभग 17 प्रतिशत बच्चों को नींद में चलने की आदत होती है। यह बीमारी खासतौर पर 3 से 8 साल तक की उम्र के बच्चों में देखने को मिलती है और उम्र बढ़ने के साथ-साथ ठीक हो जाती है। लेकिन कुछ लोगों में यह समस्या अडल्ट होने तक रह जाती है। दुनियाभर में ऐसे लोगों की संख्या 20 से 25 पर्सेंट होती है।

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अलग-अलग होती हैं स्थितियां
यह एक तरह का स्लीप डिसऑर्डर है। जिसे मेडिकल की भाषा में सोमनाबुलिज़म कहते हैं। स्लीप पैटर्न में डिस्टर्बेंस के चलते भी ऐसा होता है। स्लीप दो तरह की होती हैं। एक रेपिड आई मूवमेंट (आरईएम) और एक नॉन रेपिड आई मूवमेंट (एनआरईएम)। साथ ही डीप स्लीप यानी एनआरईएम की सिचुएशन में नींद में चलने की समस्या होती है। इसलिए जो लोग नींद में चलते हैं वो नींद के पहले ही फेज में चलते हैं। रात में कई बार हमारी नीद के फेज़ बदलते हैं। उदाहरण के लिए अगर कोई 10 बजे सोया है तो वो करीब 12 बजे के आस-पास नींद में चल सकता है। डीप स्लीप का पैटर्न होने के कारण बच्चे अलग-अलग तरह की ऐक्टिविटी करते हैं, जो आमतौर पर घातक नहीं होती हैं।

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नॉन पर्पजफुल ऐक्ट करते हैं बच्चे
इस डीप स्लीप में बच्चे सेमी पर्पजफुल ऐक्ट करते हैं। इसमें बच्चे बेड पर लेटे-लेटे ही साइक्लिंग करने लगते हैं, बेड पर ही स्विमिंग की तरह ऐक्ट करने लगते हैं या पैर पटकने लगते हैं। यह भी नींद में चलने की बीमारी का ही एक पैटर्न है। लेकिन कुछ बच्चे बेड से उतर जाते हैं, घर में ही थोड़ी दूर चलते हैं और नींद में ही रास्ता भी देख लेते हैं। जैसे वॉशरूम या किचन तक गए और लौटकर आ गए।

अडल्ट्स में हो सकता है ऐसा
स्लीप हमारे ब्रेन की सेमी कॉन्शियस स्टेज होती है। अगर अडल्ट्स में यह बीमारी होती है तो कुछ लोग बालकनी तक चले जाते हैं, कुछ घर से बाहर भी निकल जाते हैं। कई बार सामने आया है कि ड्राइविंग भी कर सकते हैं लेकिन यह पूरी तरह क्लियर नहीं है कि ड्राइविंग नींद में ही की गई है। इसलिए अगर अडल्ट्स में यह समस्या है तो उन्हें अपने घर को रात में अच्छी तरह लॉक करना चाहिए। साथ ही अकेले रहने से बचना चाहिए। बालकानी लॉक रखें क्योंकि व्यक्ति कई बार खुद को नुकसान पहुंचा सकता है। हालांकि इसकी संभावना कम होती है पर ऐसी स्थिति में सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।

बच्चों को लेकर ऐसे रहें अवेयर
जब तक बच्चा बेड पर है और इस तरह का ऐक्ट करता है तब तक तो ठीक है, कोई समस्या की बात नहीं है। लेकिन अगर बच्चा बिस्तर से उतरने लगा है तो बच्चे की सिक्यॉरिटी को ध्यान में रखना चाहिए। उनका रूम सुपरवाइज होना चाहिए। किचन बंद रखना चाहिए। अगर बच्चा बहुत जल्दी-जल्दी या बार-बार बिस्तर से उतरने का ऐक्ट कर रहा है तो आपको स्पेशलिस्ट को दिखाना चाहिए।

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किसी और बीमारी के कारण
कई बार किन्हीं दूसरी बीमारियों के कारण भी लोगों को नींद में चलने की समस्या हो सकती है। जैसे, इपिलेप्सी, कॉम्प्लेक्स फीवर और रेस्टलेग सिंड्रॉम में भी ऐसा होता है। आयरन, कैल्शियम की कमी और नशे की आदत की वजह से भी ऐसा हो सकता है।आमतौर पर यह जेनेटिक बीमारी है। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता किस जीन के कारण यह हो रहा है। इसे ईईजी से डायग्नॉज किया जाता है। कुछ दवाइयों की वजह से भी ऐसा हो सकता है।

ये हैं लक्षण
नींद में चलने की बीमारी से ग्रसित व्यक्ति रात में केवल एक ही बार बिस्तर से उठकर चलता है। यह एक रात में बार-बार नहीं होता। साथ ही यह भी जरूरी नहीं है कि पीड़ित व्यक्ति को हर रोज ऐसा होगा ही होगा। यानी यह जरूरी नहीं है कि इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति हर रोज नींद में चले ही चले। इसके कोई लक्षण नहीं होते, केवल किसी को नींद में चलते समय देखकर ही जाना जा सकता है कि इस व्यक्ति को यह समस्या है।

इस बात का रखें ध्यान
किसी को नींद में चलने पर उसे जगाएं नहीं। अगर आप उसको नींद में झकझोरेंगे तो वह अग्रेसिव हो सकता है, मार-पिटाई कर सकता है क्योंकि वह डीप स्लीप में होता है और उसे लगेगा कि कोई उस पर अटैक कर रहा है।

संभव है इलाज
डॉक्टर्स के अनुसार, इस बीमारी का इलाज पूरी तरह संभव है।। इलाज के बाद यह बीमारी एकदम ठीक हो जाती है। साथ ही डीप स्लीप में जाने के लिए पेशंट्स को मेडिसिन भी दी जा सकती है। ताकि वह एक बार सोने के बाद सीधे सुबह ही जगे। लेकिन ऐसा किसी एक्सपर्ट की राय के बाद ही करें।

क्या पड़ता है असर
अगर बड़े होने पर किसी को यह बीमारी रहती है तो वह करियर और लाइफ को लेकर थोड़ा कॉन्फिडेंस लो फील करता है। ट्रैवलिंग वगैरह से बचने की कोशिश करता है तो इससे उसके करियर पर असर पड़ सकता है। ऐंग्जाइटी रहने लगती है। अगर बड़ों में इस तरह की दिक्कत है तो उन्हें इस पर पूरा ध्यान देना चाहिए और तुरंत इलाज कराना चाहिए। डॉ. राजेश कुमार के अनुसार, यह एक पूरी तरह क्योरेबल डिजीज है और इसका इलाज संभव और आसान है। नींद में चलनेवाले लोगों को डिस्टर्ब नहीं करना चाहिए और ना ही उन्हें जगाने की कोशिश करनी चाहिए। आराम से उन्हें उनके बिस्तर तक पहुंचा दें। अगर आपके परिवार में कोई इस तरह का पेशंट है तो आप सायकाइट्रिस्ट या न्यूरोलजिस्ट से मिलें।

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