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छपाक से जुड़ी हैं लखनऊ की गजल

BZeba.Hasan@timesgroup.com

Bऐसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी की जिंदगी पर बनी फिल्म छपाक काफी चर्चा में है। फिल्म को क्रिटिक्स के साथ दर्शकों का प्यार भी मिल रहा है। यह फिल्म लखनऊ के लिए भी कुछ खास है क्योंकि इसमें शहर की गजल जावेद ने बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर काम किया है। दिलकुशा कॉलोनी में पली-बढ़ी गजल मेघना गुलजार को उनकी फिल्म तलवार और राजी में भी असिस्ट कर चुकी हैं। करीब 13 साल पहले दूरदर्शन के पपेट शो ‘गली-गली, सिम-सिम’ में चमकी के किरदार को घर-घर तक पहचान दिलाने वाली गजल अब बॉलिवुड का हिस्सा बन चुकी हैं। हालांकि चमकी आज भी उनकी पहचान है।

Bटीवी शो युद्ध से हुई थी शुरुआतB

12वीं तक लॉरेटो कॉन्वेंट में पढ़ाई करने के बाद गजल ने दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। हिस्ट्री ऑनर्स की स्टूडेंट गजल ने डीयू की स्टूडेंट्स पॉलिटिक्स में हिस्सा लिया और इलेक्शन भी जीता। 2005 में जब गजल ग्रैजुएशन सेकंड इयर में थीं तो इंडिया में ‘गली-गली, सिम-सिम’ पहली बार लॉन्च हो रहा था। यूनिवर्सिटी में उसके लिए ऑडिशन हुए और करीब पांच हजार लोगों में गजल का सिलेक्शन चमकी के लिए हुआ। कांस में होने वाला क्रिएटिव फेस्टिवल हो या फिर पेरिस में होने वाले यूनिसेफ का कार्यक्रम, गजल ने चमकी के साथ इंडिया को रिप्रेजेंट किया। हाल ही में गजल यूएई, अफगानिस्तान और सीरिया जैसे देशों में जाकर पपेट्री की ट्रेनिंग देकर आई हैं। गजल कहती हैं कि ‘गली-गली, सिम-सिम’ के दौरान ही मुझे अमिताभ बच्चन के टीवी शो युद्ध में असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम करने का मौका मिला। यह मेरा पहला शो था। इसके बाद विशाल भारद्वाज सर की फिल्म हैदर और फिर मेघना गुलजार की फिल्म तलवार में मुझे असिस्ट करने का मौका मिला। वह सफर छपाक तक जारी है।

मुद्दों से जुड़ी होती हैं उनकी फिल्में

झंवाईटोले के हकीमी परिवार से ताल्लुक रखने वाली गज़ल के नाना मोहम्मद शकील एक क्रांतिकारी थे। आठ साल की उम्र में वह जेल गए थे। गज़ल कहती हैं कि समाज के लिए कुछ करने का जज्बा मुझे विरासत में ही मिला है।’गली-गली, सिम-सिम’ करने का मेरा सबसे बड़ा मकसद यही था कि यह प्रोग्राम बच्चों को एजुकेट करता है। जहां तक सवाल मेघना मैम के साथ काम करने का है तो पिछले कई साल से हम साथ हैं। काम करते-करते कई बार मैं उन्हें मम्मी कह देती हूं। वह हंसती हैं। उनके काम की बात करूं तो मेल डॉमिनेटेड फील्ड में वह अपना बेहतरीन काम कर रही हैं। अपनी फिल्मों के जरिए वह ऐसे मुद्दों उठाती हैं, जिनमें कहीं न कहीं महिलाओं का आत्मविश्वास मजूबती से नजर आता है। छपाक के लिए जो बायकॉट कर रहे हैं, मुझे लगता है वह बेवकूफ हैं। यह फिल्म अपने आप में जुल्म के खिलाफ आवाज उठाती है। इसे हर किसी को देखना ही चाहिए। मुझे फिल्म के दौरान लक्ष्मी, जीतू जैसी कई लड़कियों से मिलने का मौका मिला।

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