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जानें, क्यों पढ़ाई के बाद बच्चे को आत्मनिर्भर बनाना है जरूरी

उमा शशिकांत, नई दिल्ली
भारत में वयस्क संतानों का अभिभावकों के साथ रहना असामान्य नहीं है। इस चलन के साथ सुविधा और शिकायत दोनों जुड़े हैं। रिसर्च से पता चलता है कि यह चलन पश्चिमी देशों सहित दुनियाभर में मौजूद है। अभिभावक अपने वयस्क बच्चों को वित्तीय सहारा देना क्यों जारी रखते हैं जिन्हें अपने जीवन के लिए खुद जिम्मेदार होना चाहिए? जीवन में बढ़ना विकल्पों को चुनने और उनके परिणामों का सामना करने से संबंधित है। ‘मदद’ देकर अभिभावक अपने वयस्क बच्चों को अपने फैसलों के लिए जिम्मेदार होने से रोकते हैं।

इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। वयस्क बच्चों को मदद करने से अभिभावकों की अपनी वित्तीय स्थिति कमजोर हो सकती है। उनके स्वास्थ्य और रिटायरमेंट के लिए जोखिम हो सकता है, उन्हें अपने असेट्स कम वैल्यू पर बेचने पड़ सकते हैं।

बच्चे को लापरवाह न बनाएं
बच्चों को लेकर बहुत अधिक चिंतित रहने वाले अभिभावकों और ऐसे माहौल में रहने वाले बच्चों के कई प्रकार हैं। इनमें ऐसे अभिभावक हैं जो इतने उपहार और नकदी देते हैं कि बच्चे पूरे जीवन लापरवाह बने रहते हैं। राजनेताओं और कारोबारियों के बारे में सोचें जो भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी संपत्ति जमा कर लेते हैं।

ऐसे बच्चे होते हैं जो अपने वयस्क जीवन को गंभीरता से नहीं लेते और लापरवाही से विकल्प चुनते हैं और अपनी खराब स्थिति के लिए दूसरों को जिम्मेदार बताते हैं। ऐसे बच्चे भी हैं जो जानते हैं कि अपने अगले बड़े खर्च के लिए अभिभावकों को किस तरह आश्वस्त करना है। ऐसे भी बच्चे मिल जाएंगे जो पैसे के लिए डराने से नहीं हिचकते।

कुछ नियमों के साथ चलाएं परिवार
हम कह सकते हैं कि ऐसी स्थिति के लिए दोनों पक्ष जिम्मेदार हैं। लेकिन यह भी सही है कि वयस्क बच्चों को वित्तीय सहायता देते रहना ठीक नहीं है। वित्तीय लेन-देन को बेहतर बनाने के लिए अभिभावक और बच्चे क्या कर सकते हैं?

पहला, यह सुनिश्चित करें कि परिवार को कुछ नियमों के साथ चलाया जाए। वयस्क संतान और उसके परिवार के अभिभावकों के साथ रहने वाले बहुत से भारतीय घरों में परिवार के खर्च के लिए एक संयुक्त खाता होता है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति योगदान देता है। यह स्पष्ट होता है कि कौन सा व्यक्ति क्या कार्य करेगा और कौन से खर्च की किसकी जिम्मेदारी होगी। किराया बचाने या संपत्ति के संभावित उत्तराधिकार के बदले में बच्चे अपने माता-पिता की देखभाल करते हैं।

बच्चों की करें सीमित मदद
दूसरा, अपने बच्चे की मांगों के जवाब में अपनी भावनात्मक सीमाओं और मनोवैज्ञानिक उत्तरों को पहचानें। दोनों अभिभावकों के लिए इस पर सहमत होना जरूरी है कि उन्हें अपने बच्चे को सीमित मदद देनी चाहिए। बहुत से अभिभावक अपने बच्चों से अलग रहते हैं लेकिन बच्चों को लेकर उनकी भावनाओं के कारण वे उनकी वित्तीय सहायता करते रहते हैं। बच्चों को यह पता होता है कि अभिभावकों को मनाने के लिए कौन सा तरीका कारगर होगा। अभिभावक चिंता, उम्मीद, डर जैसी भावनाओं के कारण बच्चों की गैरवाजिब मांगों को मान लेते हैं।

तीसरा, अपने असेट और धन की ताकत को बरकरार रखें। आपने अपने जीवन में इन्हें कमाया है और आपके पास यह तय करने का अधिकार है कि उन्हें किस तरीके से खर्च करना है। आप इसे चैरिटी में दे सकते हैं, अपने बच्चों को खर्च करने के लिए इसे देने के बजाय आप उनके बच्चों के लिए एक फंड बना सकते हैं, आपको अपनी रिटायरमेंट के लिए इसकी जरूरत हो सकती है। आपको बिना किसी हिचक के अपनी इन जरूरतों को बताना चाहिए।

बच्चे के गैरवाजिब मांग पर…
बच्चे के कोई गैरवाजिब मांग करने पर अपना सामान्य उत्तर यह होना चाहिए: ‘मैं इसके बारे में सोचकर आपको बताता हूं।’ तुरंत सहमत होने के लिए खुद पर जोर न डालें। समय लेने से बोझ कम होगा और अगर आप नहीं कहना चाहें तो आपको उसके लिए गुंजाइश मिल सकेगी। आपको यह याद रखना चाहिए कि अगर रिटायरमेंट के बाद ऐसी स्थिति आती है और आपके पास फंड की कमी होती है तो आपका जीवन बहुत मुश्किल हो जाएगा।
(लेखिका सेंटर फॉर इन्वेस्टमेंट एजुकेशन ऐंड लर्निंग की प्रमुख हैं)

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