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बबुली कोल के सफाए के बाद आतंक के साये से बाहर आएंगे बुंदेलखंड के जंगल !

लखनऊ/बांदा
70 के दशक में सीवन पंडित से लेकर बबुली कोल तक की आतंक की कहानियों के गवाह बने पाठा के जंगलों को के मारे जाने के बाद अब आतंक के साये से आजादी मिलने की उम्मीद जाग गई है। क्योंकि दोनों के मारे जाने के बाद दस्यु गिरोहों में गौरी यादव को छोड़कर ऐसा कोई नाम नहीं है जो लोगों के बीच डर का सबब बन सके। गौरी यादव भी पिछले कई महीनों से यूपी एसटीएफ और चित्रकूट पुलिस के दबाव के चलते शांत ही है।

1634 वर्ग किमी में फैले पाठा के जंगल में आतंक की एक कहानी खत्म होती तो दूसरी शुरू हो जाती थी। यह सिलसिला शुरू हुआ 70 के दशक में सीवन पंडित से। सीवन पंडित के बाद खरदूषण कुर्मी ने आतंक की कहानी को आगे बढ़ाया। खुद को कुर्मियों का खैरख्वाह बताते हुए खरदूषण ने गैंग में अपनी जाति के कई लोगों को जोड़ा। लेकिन खरदूषण को गैंग के गया बाबा कुर्मी ने एक युवती को लेकर मार दिया।

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एक की कहानी खत्म तो दूसरे की शुरू
वर्ष 1978 में गया बाबा कुर्मी के गैंग से जुड़ा। वर्ष 1983-84 में गया बाबा ने साथी शेखन व जनार्दन कुर्मी के साथ आत्मसमर्पण किया तो ददुआ ने गैंग की कमान संभाल ली। ददुआ ने बंदूक के बल पर जो खौफ की कहानी रची वह ढाई दशक तक पाठा के जंगलों को दहलाती रही। ददुआ ने दहशत के सहारे अपने आर्थिक और राजनैतिक तंत्र को खूब मजबूत किया। हालांकि इस बीच अंबिका पटेल उर्फ ठोकिया का गैंग भी तेजी से उभरा। ठोकिया के गैंग में रागिया और बलखड़िया पटेल भी थे। उधर कुर्मियों के समकक्ष यादवों के गैंग ने पांव पसारने शुरू किए। इस गैंग में खड़ग सिंह यादव, कमल सिंह यादव उर्फ पप्पू कालिंजर थे। कुर्मी और यादव गैंग के बीच अक्सर गैंगवार होती रहती थीं।

ददुआ और अंबिका पटेल का सफाया
7 जुलाई 2005 को यूपी एसटीएफ ने मुठभेड़ में ददुआ और उसके साथियों को मार गिराया। अंबिका पटेल ने इसका बदला लेने के लिए उसी दिन एसटीएफ की कमांडो टीम पर हमला कर दिया। इस हमले में एसटीएफ के जवान मारे गए। दो साल बाद एसटीएफ ने अपने जवानों की मौत का बदला लेते हुए अंबिका पटेल को मार गिराया। इसके बाद रागिया पटेल और बलखड़िया भी मारे गए।

बबुली, लवलेश ने फैलाई दहशत
पाठा के जंगलों को जब ये लगता कि अब सब कुछ शांत हो जाएगा तो नया गैंग पांव पसार लेता। जब ददुआ, ठोकिया जैसे नाम खत्म हो गए तो वर्ष 2012 में बलखड़िया गैंग के बबुली कोल ने अपना गैंग खड़ा कर लिया। उसने और और उसके रिश्तेदार लवलेश कोल ने ताबड़तोड़ वारदात कर दहशत पैदा कर दी। इन दोनों ने यूपी और एमपी में अपहरण व डकैती की कई वारदात को अंजाम दिया। बबुली के खिलाफ यूपी और एमपी में मिलाकर कुल 67 मामले दर्ज थे। उस पर यूपी से पांच लाख और एमपी से एक लाख रुपये का इनाम था।

मारने वाले ने ही दी एमपी पुलिस को सूचना
यूपी पुलिस की सूचना के मुताबिक बबुली और लवलेश को मारने वाले संजय ने ही एमपी पुलिस को उनके मरने की सूचना दी। उसके बाद एमपी पुलिस तलाशते हुए जंगल में पहुंची। सूत्रों के मुताबिक बबुली और लवलेश को मारने वालों ने साजिश के तहत रात को शराब और चिकन का इंतजाम किया गया था।

संजय ने बबुली व लवलेश को साजिश के तहत ज्यादा शराब पिला दी। वारदात के दौरान संजय, बबुली व लवकेश के अलावा दो और लोग मौजूद थे। इसमें एक का नाम राजा भैया बताया जा रहा है। संजय और उसके साथी ने जब फायरिंग की तो राजा भैया को भी गोली लगी। लेकिन वह बचकर भागने में कामयाब हो गया, जबकि बबुली और लवकेश मारे गए।

पप्पू कोल को यूपी पुलिस ने बनाया मोहरा
मानिकपुर पाठा के मोटवन कोलान का पप्पू कोल और उसका परिवार वर्तमान में टिकरिया रेलवे स्टेशन के पास कोल बस्ती मे रहता है, सूत्रों के मुताबिक पप्पू कोल का पिता राजा कोल कुछ समय पहले एक डकैत गिरोह के सम्पर्क में था, पुलिस की नजरें टेढी हुईं तो वह घर-गांव छोडकर भाग गया और वहीं रहकर मेहनत मजदूरी करने लगा। कुछ दिन बाद पुलिस ने उसे ऑन रिकॉर्ड मृत घोषित कर दिया।

हाल ही में पुलिस ने पप्पू को पकड़ा और धमकाया कि वह बबुली को मरवाने मे पुलिस का सहयोग करे, या फिर खुद मुठभेड़ में मरने को तैयार रहे। यह भी कहकर धमकाया कि पुलिस तुम्हारे पिता की असलियत जानती है, पुरानी फाइल खोलकर पूरे परिवार को तबाह कर दिया जाएगा, यह बात पप्पू ने बबुली गिरोह में रह रहे अपने रिश्तेदार लाली को बताई। जिसके बाद दोनों पुलिस के लिए मुखबिरी करने लगे।

बबुली से मुठभेड़ में शहीद हुआ था एसआई23 अगस्त 2017 को यूपी पुलिस की बबुली कोल के गैंग से कल्याणगढ़ के जंगलों में मुठभेड़ हुई थी। इस मुठभेड़ में यूपी पुलिस के दारोगा जेपी सिंह शहीद हो गए थे। बबुली कोल और उसके गैंग के लोगों ने पुलिसकर्मियों समेत कई लोगों को मुखबिरी और नजर रखे जाने के शक में मौत के घाट उतारा है। उसके खिलाफ वर्ष 2011 से 2019 के बीच यूपी (50) और एमपी (17) में 67 मामले दर्ज हुए।

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