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महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव: 'मराठाकरण' के जरिए बीजेपी के एक तीर से दो निशाने

अभिजीत आत्रे, पुणे
महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव से पहले दूसरी पार्टियों के कई नेताओं को भारतीय जनता पार्टी में शामिल कर लिया गया। एक के बाद एक पार्टी में विरोधी दलों के मराठा नेताओं के शामिल होने से पार्टी कार्यकर्ताओं में नाराजगी और सवाल हैं कि जिन लोगों ने पार्टी, खासकर संघ परिवार की विचारधाराओं का हमेशा विरोध किया गया, उनका खुली बाहों से स्वागत क्यों किया जा रहा है। यही नहीं, बीजेपी खुद इन नेताओं को भ्रष्टाचार और लोगों के हितों के खिलाफ काम करने के लिए निशाने पर ले चुकी है।

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पार्टी में शामिल हुए ज्यादातर मराठा नेता न सिर्फ उत्तर और पश्चिम महाराष्ट्र में अपने इलाकों में , बल्कि कोऑपरेटिव सेक्टर पर भी अच्छी पकड़ रखते हैं। पार्टी कार्यकर्ता इस बात से सहमत हैं कि इनके आने से पार्टी को चुनावों में फायदा होगा लेकिन उन्हें लगता है कि सीएम देवेंद्र फडणवीस और बीजेपी अध्यक्ष चंद्रकांत पाटील ने कुछ ज्यादा ही लोगों को स्वीकार कर लिया है।

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कांग्रेस-एनसीपी से निपटने के लिए जरूरी
उधर, पार्टी की रणनीति बनाने वाली टीम के एक सूत्र ने बताया है कि पार्टी का ध्यान सिर्फ आगामी चुनावों पर नहीं बल्कि इस बात पर भी है कि कांग्रेस और एनसीपी किसी ब्राह्मण-विरोधी भावना के बल पर बीजेपी को पछाड़ने की कोशिश न कर सकें। पार्टी इसे ऐसे भी देख रही है कि मराठा नेता हिंदुत्व की राजनीति को सार्वजनिक तौर पर गले लगा रहे हैं जो बीजेपी के लिए बड़ी जीत है और इससे सालों से कांग्रेस और एनसीपी के गढ़ रहे इलाकों में पकड़ बनाने में मदद मिलेगी।

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लंबे समय से छवि बदलने की थी कोशिश
बीजेपी 1980 से अपनी ऊंची जाति की छवि को बदलने की कोशिश कर रही है लेकिन यह प्रक्रिया काफी धीमी है। उसके तीन प्रमुख गैर-ब्राह्म चेहरों (गोपीनाथ मुंडे, पांडुरंग फुंडेकर और एकनाथ खड़से) में से सिर्फ एक (खड़से) ही बचे हैं। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि मराठा नेताओं को पार्टी में शामिल करने की जरूरत इसलिए आ पड़ी क्योंकि सीएम फडणवीस, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और प्रकाश जावड़ेकर भी ब्राह्मण हैं। वहीं, महाराष्ट्र की संस्कृति, साहित्य और राजनीति में ब्राह्मणवाद का विरोध करने की परंपरा रही है। ‘विद्रोही साहित्य चलवल’ और ‘ब्राह्मनेतर चलवल’ जैसे आंदोलन हो चुके हैं जिनसे 30% प्रतिशत के साथ राज्य की बहुमत वाली मराठा आबादी का वोट एकजुट हुआ है।

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साल 2014 में लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी ने अपने पोस्टर्स पर छत्रपति शिवाजी की तस्वीर लगाई और नारा दिया- ‘शिवछत्रपति का आशीर्वाद, चलो चलें मोदी के साथ’। 2016 में शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे पीएम मोदी के साथ जल पूजन के लिए शिवाजी मेमोरियल गए लेकिन फिर भी सेना के अंदर भी लोगों का मानना है कि बीजेपी उनके आइकॉन को हाइजैक करने की कोशिश कर रही है।


मराठाओं को लुभाने के कई प्रयास

2015 में मराठा आरक्षण के दौरान पार्टी ने विपक्ष की रणनीति को बुरी तरह फेल कर दिया। पार्टी ने शिवाजी के वंशज और कोल्हापुर के छत्रपति शाहू के परपोते संभाजी राजे छत्रपति को राज्य सभा में राष्ट्रपति की ओर नामित कर दिया। एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने इस पर- ‘एक फडणवीस ने छत्रपति को नियुक्त किया’ का तंज सका, लेकिन इससे पार्टी के खिलाफ कोई लहर नहीं बनी। मराठा आंदोलन की अगुवाई कर रहे राजे ने मराठा आंदोलन की मांग पूरी करने के लिए फडणवीस और बीजेपी की तारीफ भी की। अब सतारा के विधायक शिवेंद्र राजे भोसले और सांसद उदयनराजे भोसले के बीजेपी में शामिल होने से एनसीपी को झटका लगा है और पूरा परिवार बीजेपी के पाले में आ गया है।

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उल्टा न पड़ जाए दांव
मराठा और दूसरे समुदायों के नेताओं को शामिल करने में पार्टी के ही मराठा और ओबीसी नेताओं को दरकिनार कर दिया गया है जिन्हें इतने साल तक बढ़ाया गया था। कई लोगों को लगता है कि लंबी दौड़ में यह रणनीति फेल हो जाएगी। उन्हें डर है कि ये ‘मौकापरस्त’ नेता बीजेपी को छोड़ देंगे अगर उल्टी दिशा में लहर चली तो और उनके होने से पार्टी को संघ ने जो संस्कार दिए हैं, वे खत्म होने लगेंगे।

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