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रणवीर का घर की लक्ष्मी कहना अच्छा लगता है : दीपिका

BZeba.Hasan@timesgroup.com

B’पीकू’ की गुस्सैल पीकू बनर्जी से ‘कॉकटेल’ की बिंदास ‘वेरोनिका’ और ‘पद्मावत’ के ऐतिहासिक पद्मावती किरदारों को दीपिका ने जिस शिद्दत से पर्दे पर निभाया है, वो किरदार उनके शानदार फिल्मी सफर की कहानी बयां करते हैं। दीपिका शादी के एक साल बाद छपाक फिल्म से करियर की दूसरी पारी की शानदार शुरुआत कर चुकी हैं। हाल ही में रिलीज हुई फिल्म छपाक में दीपिका ने ऐसिड अटैक सरवाइवर मालती का किरदार निभाकर एक बार फिर से खुद को बेहतरीन ऐक्टर साबित कर दिया है। बिंदास, राजसी किरदारों से गुजरते हुए एक आम लड़की मालती के किरदार को निभाने वाली दीपिका अपने बोल्ड फैसलों के लिए भी हमेशा चर्चा में रहती हैं। करियर के पीक पर रणवीर सिंह से शादी का फैसला उनका ऐसा ही एक बोल्ड फैसला था। इस मुलाकात में दीपिका बॉलिवुड क्वीन से लेकर रणवीर सिंह के ‘घर की लक्ष्मी’ बनने जैसे हर सवाल का जवाब बड़ी बेबाकी से देती हैं।

Bफिल्म छपाक के लिए हां करने में कितना वक्त लगा था?B

सच बताऊं, मेघना मैम जब मुझे लक्ष्मी के बारे में बता रही थीं तो दो मिनट मैंने खामोशी के साथ सुना। बस उतनी ही देर में मैंने फैसला कर लिया था कि यह फिल्म मुझे करनी है। मैंने दो मिनट के अंदर ही मेघना जी को हां कर दी थी। इसकी सबसे बड़ी वजह थी लक्ष्मी, जिनकी जिंदगी पर यह फिल्म बनी है। पहली बार जब मैं लक्ष्मी से मिली तो सचमुच नर्वस थी। जब मैंने पहली बार लक्ष्मी को देखा तो इमोशनल हो गई थी। लेकिन मैंने उन्हें कोई सांत्वना नहीं दी क्योंकि वह अपने आप में बहुत ही मजबूत महिला हैं। वह कई लड़कियों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। इस तरह का पावरफुल किरदार निभाने का मौका मैं नहीं छोड़ना चाहती थी। मैं तो मेघना मैम की शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने मुझे मालती का किरदार निभाने का मौका दिया।

Bपहले के किरदारों को देखते हुए लक्ष्मी का किरदार कितना मुश्किल था?

Bजब मैंने लुक टेस्ट के लिए पहली बार लक्ष्मी के किरदार का मेकअप किया तो मुझे पांच घंटे लगे थे। पांच घंटे बाद जब मैंने अपने आपको आइने में देखा तो मुझे लक्ष्मी और खुद में कोई फर्क नहीं लगा। मुझे आइने में मैं ही दिख रही थी। क्योंकि कोई मुजरिम आपकी शक्ल तो बदल सकता है लेकिन आपकी आत्मा को नहीं। हमारी फिल्म छपाक भी इसी आत्मविश्वास की कहानी को बयां कर रही है। जहां तक मुश्किल आने का सवाल है तो चाहे पीकू का किरदार हो या पद्मावत का, तैयारी तो हर किरदार के लिए करनी पड़ती है। लक्ष्मी का किरदार इमोशनली काफी मुश्किल था। शूटिंग के दौरान कई सीन मुझे अंदर तक झकझोर देते थे। जितने दिन भी फिल्म की शूटिंग हुई मैं लक्ष्मी को अपने जेहन से दूर नहीं कर पाई। पहली बार मैंने रियल कैरेक्टर निभाया है, जो एक बड़ी जिम्मेदारी का काम था। जब लक्ष्मी सेट पर आईं और शूटिंग देखकर मुझसे बोलीं कि मुझे लगा कि मैं खुद को आइने में देख रही हूं, लक्ष्मी का इस तरह का कमेंट मेरे लिए बड़ी बात थी।

किरदारों को लेकर क्या चूजी हो गई हैं?

चूजी तो नहीं कहूंगी क्योंकि पहले भी जिन किरदारों को मैंने चुना है, वो भी मेरी अपनी ही पसंद थे। उन किरदारों को भी पर्दे पर पूरे दिल के साथ निभाया है। हां अब मैं अपने किरदारों को और जिम्मेदारी के साथ चुनने लगी हूं। अब मैं ऐसी फिल्मों को करना ज्यादा पसंद करूंगी, जो सोसायटी में कुछ बदलाव लाने के लिए बन रही हों। वो फिल्में करना चाहूंगी, जो लोगों के जेहन पर कुछ असर छोड़ सकें। मेरे किरदारों से अगर थोड़ा सा बदलाव आए तो मेरे लिए इससे बड़ी उपलब्धि और कोई नहीं होगी। इसके लिए जरूरी नहीं कि मालती जैसा गम्भीर किरदार हो। सिंपल इमोशंस वाली फिल्म के माध्यम से भी अपनी बात कही जा सकती है। ‘पीकू’ इसका उदाहरण है, जिसमें एक बाप और बेटी के रिश्ते को बहुत ही खूबसूरत अंदाज में पर्दे पर पेश किया गया था।

Bरणवीर का आपको घर की लक्ष्मी कहना कैसा लगा था?B

जाहिर है मुझे खुशी ही हुई थी। वह जब मेरे काम की या फिर अपनी पत्नी होने के नाते मेरी तारीफ में कुछ कहते हैं तो मुझे अच्छा लगता है। एक अवॉर्ड फंक्शन में ‘गली बॉय’ के लिए मंच पर अवॉर्ड लेने के बाद उन्होंने मंच से ही जोर से मुझे घर की लक्ष्मी बोला था। हालांकि, वह अक्सर मुझे ऐसा बोलते हैं। उनका मुझे घर की लक्ष्मी कहना अच्छा लगा। रणवीर मेरे पति ही नहीं मेरे बहुत अच्छे दोस्त भी हैं। मुझे खुशी इस बात की है कि मैं अपनी दोनों जिम्मेदारियों को निभा पा रही हूं। मैं आज जहां हूं, वो मुझे एक रात में नहीं मिला है। मैंने इसके लिए मेहनत और पूरी लगन के साथ काम किया है। जहां तक सवाल शादी के बाद काम करने का है तो शादी और करियर का कोई लेना देना नहीं है। अब तो बॉलिवुड में कई मैरिड ऐक्ट्रेस काम कर रही हैं और पावरफुल रोल में नजर आ रही हैं।

बॉक्स

Bलखनऊ में कोई बदलाव नजर आता है?

Bमैं यहां दो तीन बार आई हूं लेकिन कभी घूमने का मौका नहीं मिला। हालांकि, एक अच्छी बात जो मुझे लगी वह यह कि इस शहर ने अपने चार्म को बरकरार रखा है। कई बार कुछ शहरों में जब जाओ तो कहना पड़ जाता है कि अरे कितना बदल गया शहर। लेकिन एयरपोर्ट से लेकर होटल तक मैंने जितना भी इस शहर को देखा, आज भी मुझे वैसा ही लगता है, जैसे पहले था।

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