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शराब-बीयर का विज्ञापन किया तो छह महीने की होगी जेल

लखनऊ
शासन ने हाई कोर्ट द्वारा प्रदेश में (मादक वस्तुओं) के प्रचार और विज्ञापन पर रोक लगाने के आदेशों का कड़ाई से पालन करने के निर्देश दिए हैं। प्रमुख सचिव आबकारी संजय आर. भूसरेड्डी ने सभी जिलाधिकारियों और जिला पुलिस प्रभारियों को निर्देश यूपी के सिनेमा घरों, पत्र-पत्रिकाओं, समाचार पत्रों, टीवी चैनलों और इलेक्ट्रानिक मीडिया पर शराब और के विज्ञापनों पर तत्काल रोक लगाई जाए। इसकी अवहेलना करने वाले के खिलाफ उप्र मादक पान (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम 1976 की धारा छह के तहत कार्रवाई की जाए। इसके तहत दोषी को छह महीने की जेल की सजा का प्राविधान है।

हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिए थे कि इसका कड़ाई से पालन किया जाए। सरकार, आबकारी आयुक्त और पुलिस अधिकारी इस निर्देश का उल्लंघन करने वालों पर कड़ी कार्रवाई करें। कोर्ट का कहना था कुछ कंपनियां प्रत्यक्ष रूप से शराब का विज्ञापन न करके परोक्ष रूप से (सेरोगेसी की तरह) विज्ञापन दे रही हैं। ऐसा भी नहीं किया जा सकता है।

आबकारी विभाग की निंदा करते हुए कोर्ट ने कहा कि विभाग राजस्व के लालच में संविधान और कानून की अनदेखी कर रहा है। कोर्ट ने कहा था कि कई शराब कंपनियां दूसरे उत्पादों के साथ अपने ब्रांड का विज्ञापन परोक्ष रूप से कर रही हैं। ऐसा करना शराब को बढ़ावा देना है।

हाई कोर्ट ने आगे कहा, ‘संविधान के अनुच्छेद 47 और आबकारी कानून की धारा तीन में दवा बनाने के सिवाय नशीले पदार्थों के प्रचार को प्रतिबंधित किया गया है। चूंकि इसके विज्ञापन से सरकार को काफी राजस्व मिलता है और उसकी अच्छी आमदनी होती है इसलिए सरकार कानून का पालन नहीं कर रही है। सरकार परोक्ष रूप से शराब के विज्ञापन की अनुमति दे रही है जो गलत है।’

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