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1 अक्टूबर से आपके लोन पर क्या असर होगा?

नरेंद्र नाथन
बैकिंग सिस्टम में ढांचागत बदलाव हो रहा है। बैंक 1 अक्टूबर से मार्जिनल कॉस्ट ऑफ लेंडिंग रेट () सिस्टम से एक्सटर्नल बेंचमार्क के आधार पर कर्ज देंगे। इसका आम लोगों पर क्या असर होगा, इसे समझने के लिए हमें बदलाव के आधार को समझना होगा। अक्टूबर से बैंक सिर्फ रीपो-लिंक्ड के बजाय बाहरी बेंचमार्क-लिंक्ड लोन भी देंगे। सरकारी बैंक रीपो रेट से जुड़े उत्पादों को आक्रामक रूप से बढ़ा रहे हैं।

अधिकांश प्राइवेट बैंक अपने लोन प्रॉडक्ट्स को तीन महीने की ट्रेजरी बिल से लिंक करने के लिए 30 सितंबर की डेडलाइन का इंतजार कर रहे हैं। सिटीबैंक पहले ही एक्सटर्नल बेंचमार्किंग को अपना चुका है। RBL बैंक के इनक्लूजन और रूरल बिजनस (रिटेल) के हेड हरजीत तूर का कहना है, ‘बैंकों के पास बेंचमार्क के कई विकल्प उपलब्ध हैं। हालांकि, ज्यादातर बैंक रीपो रेट को तरजीह दे रहे हैं क्योंकि यह रोजाना बदलने वाले अन्य बेंचमार्क रेट के मुकाबले ज्यादा स्थिर है।’ दूसरे, ये बदलाव फिक्स्ड रेट लोन के बजाय सिर्फ फ्लोटिंग रेट लोन पर हो रहे हैं। इसलिए होम और वर्किंग कैपिटल जैसे कर्ज नए सिस्टम में शिफ्ट हो जाएंगे; वहीं ऑटो, पर्सनल जैसे लोन में कोई बदलाव नहीं होगा। तीसरे, नया रिजीम बैंकों पर लागू होगा। नॉन-बैंकिंग फाइनैंस कंपनियों (NBFC) पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।

HDFC जैसी अग्रणी होम लोन कंपनियां बदलाव के दायरे में नहीं आएंगी। हालांकि, अगर नए सिस्टम को अपनाने से अन्य कर्जदाताओं कर्ज सस्ता होता है तो प्रतिस्पर्द्धा के कारण NBFC को भी दरों में कटौती करनी पड़ेगी। आखिरी बात, रेट में बदलाव सिर्फ नए लोन पर ही लागू होंगे, सभी मौजूदा लोन जस के तस बने रहेंगे।

भारी कमी के आसार नहीं
अगर आपको लगता है कि इस बदलाव से कर्ज बहुत सस्ता हो जाएगा तो यह ख्याल मन से निकाल दीजिए। बैंक ऑपरेटिंग कॉस्ट और रिस्क प्रीमियम को कवर करने के लिए भारी ‘स्प्रेड’ जोड़ रहे हैं। मिसाल के लिए, SBI के होम लोन के लिए MCLR के तहत 8.25 पर्सेंट मुकाबले सबसे कम रीपो-लिंक्ड रेट 8.05 पर्सेंट है। नए फ्लोटिंग रेट लोन एक्सटर्नल बेंचमार्क से लिंक होंगे, लेकिन ज्यादातर बैंक के डिपॉजिट अभी भी फिक्स्ड रेट रिजीम के तहत हैं और इससे उनका ऐसेट-लायबिलिटी मिसमैच (ALM) बढ़ जाएगा। RBL बैंक के हरजीत ने कहा, ‘चूंकि रिटेल डिपॉजिटर्स की बाहरी बेंचमार्क-लिंक्ड डिपॉजिट में ज्यादा दिलचस्पी नहीं है। इसलिए बैंकों के लिए ALM जोखिम काफी ज्यादा होगा। इसका बोझ हाई स्प्रेड के साथ कर्ज लेने वाले पर डाला जा सकता है।’

निकट भविष्य में कम ब्याज
एक छोटे अंतर (ऊपर SBI के दिए उदाहरण के मुताबिक 20 bps) के अलावा रीपो-लिंक्ड रेट शॉर्ट टर्म में और गिर सकते हैं क्योंकि RBI रीपो रेट को घटाकर करीब 5 पर्सेंट तक ला सकता है। हालांकि यह तकरीबन 15 वर्षों के निचले स्तर पर है। इसलिए इसके 5 पर्सेंट से नीचे जाने की संभावना काफी कम है। ऐसे में यह दोधारी तलवार साबित हो सकता है। एक बार ‘रिवर्स जर्नी’ शुरू होने (चार्ट देखें) के बाद कर्ज की दरें तेजी से बढ़ सकती हैं या फिर RBI अचानक रेट बढ़ाने का फैसला भी कर सकता है, जैसा इसने 2010 में किया था।

बढ़ेगी पारदर्शिता
इस कदम से पारदर्शिता बढ़ेगी। मायमनीमंत्र के फाउंडर और एमडी राज खोसला कहते हैं, ‘इस कदम से पारदर्शिता में महत्वपूर्ण सुधार होगा। अब हर कर्जदार को पता चल जाएगा कि उसकी लोन की दर क्या है और वह क्यों बढ़ या घट रही है।’

फास्टर रीसेट
नई प्रणाली का एक और फायदा फास्टर रीसेट क्लॉज है। RBI ने बैंकों से तीन महीने के भीतर रीसेट करने को कहा है। SBI के रीपो-लिंक्ड लोन मासिक आधार पर रीसेट किए जाएंगे। रीपो रेट में कोई भी बदलाव अगले महीने के पहले दिन ट्रांसमिटेड किया जाएगा।

मौजूदा कर्ज के बारे में क्या?
चूंकि, इस ढांचागत बदलाव ने मौजूदा कर्ज को ऑटोमेटिक तरीके से प्रभावित नहीं किया है तो कर्ज लेने वालों को बैंक शाखा में जाकर परिवर्तन का अनुरोध करना होगा। नए नियम बैंकों को पिछले सिस्टम से नए सिस्टम में ग्राहकों को ट्रांसफर करते समय उचित प्रशासनिक शुल्क लगाने की इजाजत देते हैं। इसलिए आपको इस काम के बदले कुछ पैसे देने के लिए भी तैयार रहना होगा। अगर आपका बैंक रीपो-लिंक्ड लोन पर ज्यादा स्प्रेड रख रहा है तो एक नए बैंक में शिफ्ट होने का विकल्प भी खुला रखना चाहिए, जो कम स्प्रेड ऑफर कर रहा हो। आप यह कैसे तय करेंगे कि नए बैंक में शिफ्ट करना है या नहीं? राज खोसला का कहना है, ‘शिफ्टिंग प्रॉसेस में अतिरिक्त कार्य शामिल हैं। अगर यह अंतर 50 bps से कम है तो शिफ्ट करने का कोई मतलब नहीं है।’

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